रोडवेज बसों में चालक की सीट के पास तारों का जाल फैला हुआ था। इनके स्पार्किंग हुई तो बस को आग का गोला बनते देर नहीं लगेगी। इमरजेंसी द्वार पहले से ही बंद है, मथुरा जैसे हादसा होने पर बचाव क्या स्थिति होगी, इसकी कल्पना ही डराती है। ये हाल तो तब है कि बसों में आग लगने की कई घटनाएं हो चुकी है। नवंबर माह में जट्टारी में रोडवेज की सीएनजी बस में शार्ट सर्किट से पूरी बस में धुआं भर गया था। मई माह में अकराबाद टोल के पास बिल्हौर से पानीपत जा रही निजी बस में आग लग गई थी।
जुगाड़ पर टिका क्लच
कुछ रोडवेज बसों में चालक की सीट पर क्लच पैडल के पास ईंट रखी मिली। जानकारी करने पर पता चला कि चालकों की सीट और क्लच व ब्रेक पैडल तक चालकों के पैर ठीक से नहीं पहुंच पाते। सीटें एडजेस्ट नहीं हो पाती है। लगातार पैर की एडी को उन्हें उठाकर रखना पड़ता है। ऐसे में उन्होंने ईंट का जुगाड़ ढूंढ निकाला। इससे उनके पैर की एडी और पंजे की पहुंच आसानी से कल्च तक हो जाती है। लेकिन यह जुगाड़ फेल भी हो सकता है, ईंट सरक कर ब्रेक के पास तक पहुंची को ब्रेक लगाने में समस्या हो सकती है।
आग बुझाने के सिलिंडर भी हो गए हैं एक्सपायर
कहने के लिए तो रोडवेज बसों में आग बुझाने के सिलिंडर भी रखे गए हैं, लेकिन उनमें अधिकांश एक्सपायर हो चुके हैं। पड़ताल में एक बस में रखे सिलिंडर को देखा गया तो उसकी हालत यह थी कि जरूरत पड़ने पर यह काम भी आएगा या नहीं, इस पर संश्य है।