अलीगढ़। जिला पंचायत के 47 सदस्य वाले सदन में अध्यक्ष पद के लिए 2-3 मई को सदस्यों का परिणाम आने के बाद साफ हो गया था कि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं है। निर्दलीयों और जोड़-तोड़ के सहारे यह चुनाव जीता जा सकेगा। उसी समय से जोड़-तोड़ भी शुरू हो गई थी। मगर ऐसा अनुमान न था कि इस जोड़-तोड़ का परिणाम इतना प्रचंड होगा कि समूचा विपक्ष ही ढेर हो जाएगा और विपक्षी सिर्फ आठ मतों पर सिमट कर रह जाएगा।
इस परिणाम ने भाजपा की 30 मतों से हुई प्रचंड जीत से साफ कर दिया कि रालोद-सपा के सदस्यों के अलावा बसपा व कांग्रेस के समर्थन से जीते सदस्यों के भी वोट मिले हैं। इस क्रास वोटिंग और मूक समर्थन के प्रबंधन ने विपक्षी खेमे में हलचल पैदा कर दी है और क्रास वोटिंग करने वालों पर किस तरह से गाज गिरेगी, यह वक्त ही बताएगा।
कल्याण सिंह के परिवार से जुड़ी थी प्रतिष्ठा
कहने को जिला पंचायत के इस चुनाव के समय से ही जिले के कई दिग्गज नेता अध्यक्ष तक पहुंचने का सपना पाले थे। कइयों ने तैयारी भी की। सबसे बड़ा नाम पूर्व मंत्री ठा. जयवीर सिंह परिवार का था। हालांकि बाद में इस परिवार ने सदस्य पद पर चुनाव नहीं लड़ा। इसके अलावा पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सुधीर चौधरी ने भी तैयारी की। मगर वे खुद हार गए और उनकी पत्नी अंजू जीत गईं। इसी तरह जहरीली शराब कांड में जेल गए अनिल चौधरी की पत्नी ममता का नाम भी आया। मगर, अनिल के जेल जाने के कारण वह पीछे हट गईं।
उसी समय वरिष्ठ भाजपा नेता व एटा सांसद राजू भैया के समधी श्यौराज सिंह ने अपनी पत्नी विजय सिंह को सदस्य का चुनाव लड़ाकर तय कर दिया कि वे अध्यक्ष की तैयारी कर रहे हैं। उनके जीतने के बाद पार्टी ने हरी झंडी दे दी। इसके बाद इस चुनाव से यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह परिवार की प्रतिष्ठा जुड़ गई। खुद कल्याण सिंह के पुत्र राजू भैया व उनके बेटे प्रदेश सरकार में मंत्री संदीप सिंह, भाजपा के दूसरे वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री जयवीर सिंह ने विजय सिंह को अध्यक्ष बनाने के लिए मैनेजमेंट शुरू किया। इसी मैनेजमेंट के तहत सुधीर चौधरी की पत्नी अंजू की दावेदारी वापस कराई और वे विजय सिंह के समर्थन में आ गईं। फिर राह आसान होती चली गई।
भाजपा को बागियों, निर्दलीयों के अलावा विपक्ष से समर्थन
जिला पंचायत सदस्यों के जिस वक्त परिणाम जारी हुए, उस वक्त खुद भाजपा के समर्थन से कुल 9 प्रत्याशी जीते। साथ ही छह ऐसे पार्टी कार्यकर्ता बागी के रूप में जीते, जिन्होंने टिकट न मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ा। 15 निर्दलीय चुनाव जीते थे। बसपा ने खुद के 7, सपा ने 6, रालोद ने 5, कांग्रेस ने 1, आजाद समाज पार्टी ने 1 सदस्य के जीतने का दावा किया। इस परिणाम के सामने आने के बाद ही तय हो गया था कि जो निर्दलों का समर्थन पा लेगा, वही अध्यक्ष पद पर कब्जा करेगा। मगर यहां उससे ज्यादा वोट भाजपा ने पाए हैं, जिससे साफ है कि उन्हें अन्य विपक्षी दलों से भी वोट मिले हैं।
ये रहा आज क्रास वोटिंग का नजारा
सपा-रालोद खेमे से सुबह सबसे पहले अर्चना यादव अपने साथ दो पार्टी वोटरों को लेकर गईं। इसके बाद एक अन्य पार्टी नेता सहित तीन वोटर पहुंचे। फिर रालोद के दो वोटर पहुंचे और दो बाद में पहुंचे। अंत में रालोद से पहले प्रत्याशी और बाद में नाम वापस लेने वाली राजकुमारी पहुंचीं। इस तरह कलेक्ट्रेट में परिणाम जारी होने से पहले यह चर्चा रही कि हो न हो, 11 वोट तो सपा को मिलेंगे। इसी बीच जब भाजपा के सदस्य बस में सवार होकर पहुंचे तो उनमें भाजपा, निर्दल, पार्टी के सभी बागी तो थे ही। साथ में उनमें सपा, रालोद, कांग्रेस व आजाद समाज पार्टी समर्थित वोटरों को देख सभी दंग थे। वहीं, बसपा के समर्थन से आए सभी वोटरों को देख भी लोग हैरान थे। उसी समय यह माना जा रहा था कि भाजपा को अन्य पार्टियों के सदस्यों का समर्थन है, इसलिए 34 वोट मिल सकते हैं। इसी बीच एक रालोद समर्थित निर्दल वोटर बाद में भाजपा नेताओं के साथ आईं तो यह आंकड़ा बढ़कर 35 माना जा रहा था। मगर जब परिणाम 38 पर आया तो साफ हो गया कि सपा-रालोद खेमे से टुकड़ों में आए 11 वोटरों में से ही क्रास वोटिंग हुई है।
दलीय दिग्गजों की बदली आस्था
बस में आए सदस्यों में ऐसे विपक्षी दल के दिग्गज भी भाजपा के साथ खड़े दिखाई दिए जो खुद या उनके परिवार के लोग अपनी-अपनी पार्टियों में पद पर रहे हैं। या अध्यक्ष पद के चुनाव से कुछ समय पहले तक अपने दलों के अध्यक्ष प्रत्याशी लड़ाने की तैयारी कर रहे थे।
कुछ ने प्रमुखी के बदले न्योछावर किया वोट
इस चुनाव में कुछ जिला पंचायत सदस्य ऐसे भी दिखाई दिए जो अन्य दलों से ताल्लुक तो रखते हैं। मगर आने वाले ब्लाक प्रमुख चुनाव में उनके परिवार के लोग प्रबल दावेदार हैं। ऐसे में उन्हें भाजपा से किसी तरह की दिक्कत न हो, इसी मैनेजमेंट के तहत उन्होंने इस चुनाव में भाजपा के लिए अपना वोट न्योछावर किया है।
क्रास वोटिंग का संदेह : रामबहादुर
अलीगढ़। जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में राष्ट्रीय लोकदल के जिला पंचायत सदस्यों पर क्रास वोटिंग करने का संदेह पूर्व जिलाध्यक्ष चौधरी रामबहादुर सिंह ने जताया है। क्रास वोटिंग की जांच-पड़ताल करने के बाद शीर्ष नेतृत्व को पूरी रिपोर्ट सौंपी जाएगी।
रालोद समर्थित सात प्रत्याशियों ममता देवी, कुलदीप चौधरी, राजकुमारी देवी, अमित ठेनुआं, प्रदीप चौधरी, योगेश प्रधान, नीरज सूर्यवंशी ने जिला पंचायत सदस्य पद का चुनाव जीता था, जबकि चार निर्दलीय प्रत्याशी विजयी हुए थे, जिन्हें पार्टी के पदाधिकारी अपने खेमे का मान रहे थे। 11 जिला पंचायत सदस्यों के एकजुट होने का दावा किया गया था। इसी आधार पर रालोद समर्थित जिला पंचायत सदस्य राजकुुमारी देवी ने अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने के लिए पर्चा खरीदा था, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने सपा प्रत्याशी अर्चना यादव को समर्थन देने का आदेश दे दिया। इसके बाद रालोद-सपा की संयुक्त प्रत्याशी के तौर पर अर्चना यादव चुनाव मैदान में उतरीं, जहां उन्हें हार मिली।
भाजपा प्रत्याशी विजय सिंह को कुल 47 में से 38 मत मिले, जबकि अर्चना को केवल 8 मत मिले। हालांकि ममता देवी वोट डालने नहीं आईं। सपा समर्थित सात व रालोद समर्थित सात प्रत्याशी जिला पंचायत सदस्य का चुनाव जीते थे, लेकिन अर्चना यादव को केवल आठ वोट मिले, जिस पर रालोद के पूर्व जिलाध्यक्ष चौधरी राम बहादुर सिंह ने क्रास वोटिंग का संदेह जताया है। उन्होंने कहा कि इसकी जांच की जा रही है। पूरी रिपोर्ट शीर्ष नेतृत्व को भेजी जाएगी। अगर क्रास वोटिंग पाई गई तो शीर्ष नेतृत्व कड़ी कार्रवाई करेगा। रामबहादुर ने कहा कि जोर-जबरदस्ती से चुनाव हराया गया है। मतदान में दबाव का असर देखने को मिला।
सपा में भी क्रास वोटिंग पर जांच, कार्रवाई के संकेत
इधर, समाजवादी पार्टी ने भी माना है कि उनकी पार्टी के तीन व रालोद के तीन सदस्यों ने क्रास वोटिंग की है। इसे लेकर जांच पड़ताल की जाएगी। इसके आधार पर पार्टी नेतृत्व को सभी जानकारी मुहैया कराई जाएगी। इसके बाद पार्टी नेतृत्व स्तर से उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकेगी।