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बिजली थाने के कानून निराले: मुकदमों में न विवेचना, न चार्जशीट, फाइनल रिपोर्ट लगाकर केस कर डाले सॉल्व

Sat, 14 Dec 2024 12:33 PM IST
चमन शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़

सार

बिजली थानों के विवेचक फाइनल रिपोर्ट लगाने पर ज्यादा काम कर रहे हैं। आरोपी उपभोक्ता को बुलाकर समझा दिया जाता है कि अगर वह बिजली चोरी को स्वीकार कर लेता है और जुर्माना जमा कर देता है तो केस खत्म कराया जा सकता है।
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बिजली विभाग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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आमतौर पर जब किसी थाने में मुकदमा दर्ज होता है तो विवेचना होती है, साक्ष्य जुटाए जाते हैं और फिर आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की जाती है। लेकिन बिजली थाने में दर्ज मुकदमों में फाइनल रिपोर्ट (अंतिम रिपोर्ट) लगाई जा रही है। अदालत के सामने जब इस तरह के कई मामले आए तो मुकदमों की छंटनी कराई गई। कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए एसएसपी को पत्र लिखकर जांच कराने को कहा है।

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अलीगढ़ में तीन साल पहले (2021) में बिजली थाना खुला था। उससे पहले बिजली चोरी के सभी मुकदमे संबंधित थानों में ही दर्ज होते थे। थाने के ही दरोगा मुकदमों की विवेचना किया करते थे। उस वक्त सभी मुकदमों की कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की जाती थी। लेकिन अब बिजली थानों के विवेचक फाइनल रिपोर्ट लगाने पर ज्यादा काम कर रहे हैं। आरोपी उपभोक्ता को बुलाकर समझा दिया जाता है कि अगर वह बिजली चोरी को स्वीकार कर लेता है और जुर्माना जमा कर देता है तो केस खत्म कराया जा सकता है। अलीगढ़ के बिजली थाने में 2000 मुकदमे दर्ज हैं। इन सभी को तेजी के साथ फाइनल रिपोर्ट लगाकर बंद किया जा रहा है।

अब तक सामने आ चुके हैं 30 मुकदमे
विद्युत विभाग के अधिवक्ता प्रमोद कुमार कुलश्रेष्ठ ने बताया कि वर्ष 2019-20 में ईसी एक्ट के मुकदमों का निस्तारण न्यायालय में होने के दौरान यह सभी तथ्य सामने आए हैं। 30 से अधिक मुकदमे अब तक छंटनी में मिल चुके हैं, जिनमें देखा गया है कि जिस भवन में बिजली चोरी पकड़ी गई और मुकदमा दर्ज हुआ। उस भवन के बिजली संयोजन धारक की मुकदमे से पहले मौत हो चुकी है। विवेचक बस इसी को आधार मानकर मुकदमे में एफआर लगाकर भेज दे रहे हैं। 
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एडीजे ईसी एक्ट के विशेष न्यायाधीश संजय कुमार यादव प्रथम की ओर से आपत्ति लगाते हुए एसएसपी को पत्र भेजा गया है। पत्र में कहा गया है कि ऐसे मामलों में मुकदमे में उल्लेखित तथ्यों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि मुकदमा दर्ज होने के समय बिजली चोरी का अपराध संयोजन धारक के बजाय किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया था। ऐसे में विवेचक ने खानापूर्ति व लापरवाही करते हुए संयोजन धारक की मृत्यु को ही आधार मानकर एफआर दी है। जो आपत्तिजनक है। अदालत ने ऐसे मुकदमों में दिए गए अग्रिम विवेचना के आदेश संबंधी ब्योरा पत्र के साथ संलग्न कर भेजा है।

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