जहरीली शराब से जिले में मौतों के बाद बेशक देशी शराब तस्कर पुलिस के रडार पर हैं और उन पर लगातार शिकंजा कसा जा रहा है। मगर तीन दिन से चल रहे घटनाक्रम के बीच एकाएक कुट्टू की डिमांड बढ़ने से एक नए संकट के संकेत मिल रहे हैं। जिले में बड़े पैमाने पर बिकने वाला कुट्टू भी आगे चलकर कहीं मौतों का कारण न बने, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। दवा के रूप में सस्ती कीमत में बिकने वाले कुट्टू से लोग नशे की लत पूरी कर रहे हैं। शनिवार को ही लोधा में बाटलिंग प्लांट के पास एक युवक बेसुध मिला था, जिसने बाद में स्वीकारा कि गांव में शराब न मिलने के कारण वह जलालपुर से कुट्टू पीने गया था। एक शीशी भी उसकी जेब में मिली। इसी तरह बाईपास से सटे गांवों में नशे के आदि लोगों के बीच कुट्टू खूब बिक रहा है।
इन इलाकों में हैं शराब तस्करों की जड़ें
अलीगढ़। जिले में इन दिनों शराब तस्कर भी खूब खोजे जा रहे हैं। वैसे तो पुलिस के पास सभी के इनपुट हैं और धर पकड़ अभियान जारी है। मगर अपने शहर में कई प्रचलित ठिकाने हैं और कई ऐसे नाम हैं जो इस धंधे में हैं। इसके अलावा देहात में बात करें तो गोंडा, जवां, खैर, टप्पल, पिसावा, दादों आदि इलाकों में ऐसे तस्करों की जड़ें बेहद गहरी हैं।
ब्लैक लिस्टेड हुए थे अनिल-सुधीर, फिर शुरू किया धंधा
अलीगढ़। पुलिस द्वारा जहरीली शराब कांड में मुख्य आरोपियों के रूप में गिरफ्तार किए गए रालोद नेता अनिल चौधरी को लेकर एक और इनपुट शासन स्तर तक सवाल खड़े कर रहा है। वर्ष 2010-11 में इन दोनों भाइयों को जिला प्रशासन की ओर से शराब तस्करी के आरोपों के चलते शराब कारोबार न करने के लिए ब्लैक लिस्टेड किया गया था। बावजूद इसके इन्होंने अपने रसूख व सिस्टम में मिलीभगत के दम पर खुद पर लगा प्रतिबंध हटवा लिया और फिर इस गोरखधंधे में शामिल हो गए।
क्या है कुट्टू
स्प्रिट से टिंचर-जिंजर नाम की अस्थमा व खांसी में दी जाने वाली एक दवा है। वैसे तो नियमत : यह मेडिकल स्टोर पर ही बिकनी चाहिए। डॉक्टर के पर्चे पर इसकी बिक्री का नियम है और दवा के रूप में इसका सेवन किया जाता है। मगर देशी शराब के पौवा से आधी कीमत में मिलने वाली इसकी 100 एमएल की शीशी एक साथ पीने से नशे की लत पूरी होती है और यह धीमे जहर के रूप में मौत तक पहुंचाती है। लगातार सेवन से स्प्रिट शरीर को अंदर गलाती है और कुछ अंतराल के बाद एकाएक मौत का कारण बनती है।
इन इलाकों में होती है बिक्री
अपने शहर के देहली गेट, कोतवाली, सासनी गेट, बन्नादेवी व गांधीपार्क इलाके में सर्वाधिक इसकी बिक्री होती है। निर्धारित मेडिकल स्टोरों के अलावा सुबह शाम दूध व ब्रेड की सप्लाई की तर्ज पर इन इलाकों की मजदूर व स्लम बस्तियों में कुट्टू की सप्लाई होती है। कुछ मेडिकल स्टोर तो ऐसे भी हैं, जहां सिर्फ कुट्टू ही बिकता है। बाकी कोई सामान उस दुकान पर नहीं मिलेगा।
ये भी है नियम
कुट्टू बेचने वाले मेडिकल स्टोर संचालकों को शराब की तरह उसका भी स्टॉक मेनटेन करना होता है और डॉक्टर के पर्चों से बिक्री का हिसाब किताब रखना होता है। मगर सिर्फ कुट्टू बेचने वाले मेडिकल स्टोरों पर शायद ही कोई लेखा जोखा मिले।
मजदूर-भट्ठियों पर काम करने वाले करते हैं अधिक सेवन
शहर में ताला व हार्डवेयर कारोबार से जुड़ी लोहा-पीतल गलाने की भट्ठियों पर जो मजदूर आग के सामने दिन भर काम करते हैं, उनमें इसके सेवन की ज्यादा लत होती है। कहा जाता है कि इसे बिना पीकर वे भट्ठियों के सामने बैठकर काम नहीं करते। कुछ दिन में वे इसके आदी हो जाते हैं और फिर लगातार सेवन से मौत के मुहाने तक पहुंचते हैं। साथ में सस्ता नशा पाने के फेर में मजदूर तबका भी इसका सेवन करता है। अगर सर्वे कराया जाए तो पुराने शहर में इसके सेवन से मरने वालों की संख्या काफी होगी।