इतिहासकार एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. नईम उर्रहमान फारूकी ने कहा कि मुगल बादशाह अकबर ने भारत की गंगा जमुनी संस्कृति को आगे बढ़ाया और विभिन्न धर्मों के बीच आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए सुलह कुल नीति को अपनाया।
प्रो. फारूकी बुधवार को एएमयू फारसी शोध संस्थान द्वारा ‘अकबर और सफवी के शासनकाल में फारसी भाषा एवं साहित्य के विभिन्न आयाम’ पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के उद्घाटन समारोह को संबोधित कर रहे थे।
जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. तलत अहमद ने कहा कि मुगल कालीन भारत में फारसी भाषा एक सरकारी भाषा थी जिसने भारतीय संस्कृति और साहित्य पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने कहा कि एएमयू, जामियॉ मिल्लिया एवं जेएनयू आदि में फारसी भाषा पर अच्छा काम हो रहा है। कुलपति जमीरउद्दीन शाह ने कहा कि फारसी एक खूबसूरत भाषा है। और भारतीय इतिहास फारसी भाषा में सुरक्षित है। अतिथियों का स्वागत संस्थान की निदेशक प्रो. आजरमी दुख्त सफवी ने किया।
उन्होंने कहा कि भारत में अकबर और ईरान में सफवी का जमाना एक ही था और अकबर के युग में बहुत से फारसी विद्वान भारत आए थे। इस अवसर पर कुलपति ने कई पुस्तकों का विमोचन किया। ईरान के भारत स्थित कल्चरल काउंसलर डॉ. अली देगाही, तेहरान विवि के प्रोफेसर महदी महफूजी और डॉ. महदी वधेरी ने भी फारसी भाषा में अपने विचार व्यक्त किए।
अल्पसंख्यक स्वरूप पर ‘नो कमेंट’
अलीगढ़। जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. तलत अहमद ने अल्पसंख्यक स्वरूप पर कुछ नहीं बोला। फारसी भाषा पर एएमयू में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में पहुंचे प्रो. अहमद को पत्रकारों ने घेर लिया और अल्पसंख्यक स्वरूप से संबंधित प्रश्न पूछे। लेकिन इस मसले पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
प्रो. अहमद ने कहा कि तीन दिवसीय सेमिनार में ईरान एवं दूसरे देशों के विद्वान आए है। इससे अकबर के जमाने के लिटरेचर की जानकारी मिलेगी। उम्मीद है कि तीन दिवसीय सेमिनार में कुछ नई चीजें निकल कर आएगी।