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अहमदाबाद ब्लास्टः पुलिस इंस्पेक्टर के फ्लैट में किरायेदार है सिमी सर्वेसर्वा और परिवार

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दोदपुर स्थित अपार्टमेंट में इंस्पेक्टर मोहम्मद हनीफ के फ्लैट में किराये पर रहता था अब्दुल्ला द? - फोटो : CITY OFFICE
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अभिषेक शर्मा
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दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा गिरफ्तार किया गया 19 साल से फरार सिमी का सर्वेसर्वा अब्दुल्ला दानिश यहां यूपी पुलिस के इंस्पेक्टर मो.हनीफ खां के फ्लैट में किरायेदार है। शमी अपार्टमेंट दोदपुर की तीसरी मंजिल पर फ्लैट नंबर सी-3 में वह परिवार के साथ डेढ़ दशक से रह रहा है। शनिवार सुबह अब्दुल्ला दानिश दंपती के अपहरण का शोर मचा तो एकबारगी तो सिविल लाइंस पुलिस के भी पसीने छूट गए थे। मगर, केला नगर चौराहे के सीसीटीवी ने जब यह गवाही दे दी कि दिल्ली पुलिस की दो जीप उसे साथ ले गई है तो यहां की पुलिस उसी समय राहत में आ गई थी। इस खबर पर परिवार मालवीय नगर थाना दिल्ली पहुंचा, जहां से मां को रविवार सुबह ही अपने साथ लेकर अलीगढ़ आ गया। इस दौरान अमर उजाला टीम ने परिवार से फ्लैट पर पहुंचकर बात करने की कोशिश की, मगर बात करने से इंकार कर दिया। एक ही जवाब दिया कि जो भी पूछना है, दिल्ली पुलिस से पूछो।
शनिवार सुबह अब्दुल्ला हनीफ अपनी पत्नी के साथ किसी रिश्तेदार की शादी में कानपुर जाने के लिए घर से टिर्री में रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुआ था। मगर, बीच में ही पुलिस ने दबोच लिया। रविवार को जब दिल्ली पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी का बयान जारी किया तो अमर उजाला टीम ने उनके दरवाजे पर दस्तक दी। हालांकि, अब्दुल्ला की पत्नी ने दरवाजा खोला। खुद को बीमार बताकर कुछ भी बात करने से इंकार कर दिया। इसके बाद उनके बेटे से बातचीत की कोशिश हुई। मगर उन्होंने भी बोलने से इंकार कर दिया। नौकरानी व अपार्टमेंट में रहने वालों से मिली जानकारी के अनुसार घर में बुजुर्ग दंपती के अलावा चार बेटे हैं। एक बेटी बाहर रहकर पढ़ाई कर रही है। काम धंधा क्या है, कोई नहीं जानता। हां, इतना जरूर है कि अब्दुल्ला कुछ लिखा-पढ़ी करती रहते हैं। इतना जरूर पता है कि अलीगढ़ आने से पहले अब्दुल्ला व उसका परिवार दिल्ली में कहीं बतौर अनुवादक ही नौकरी करता था।
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अब परिवार व करीबी स्थानीय पुलिस के रडार पर
एसएसपी मुनिराज जी का कहना है कि शनिवार को जिस बुजुर्ग दंपती के अपहरण की सूचना मिली थी, उसे दिल्ली की स्पेशल सेल लेकर गई। वहां पूछताछ के बाद उजागर हुआ कि वह 19 साल से फरार सिमी का सक्रिय सदस्य है। वह परिवार के साथ यहां सिविल लाइंस में किराये पर रहता है। अब दिल्ली पुलिस पूछताछ के जो भी मिनिट्स बनाकर भेजेगी, उसके अनुसार परिवार, उसके करीबी लोगों को जांच के दायरे में लिया जाएगा। दिल्ली पुलिस या खुफिया एजेंसियां जो भी मदद मांगेंगी वह की जाएगी।
अर्से से नहीं दिखी थी सक्रियता
बतौर उर्दू व फारसी अनुवादक के रूप में पहचान रखने वाला अब्दुल्ला दानिश लंबे समय से एटीएस व खुफिया निगरानी में रहा। पुराने जानकार व खुफिया सूत्रों की मानें तो अब्दुल्ला का नाम सिमी के कट्टरपंथी सोच वाले नहीं, बल्कि शांत स्वभाव वाले सदस्यों की सूची में था। इसलिए बहुत ज्यादा सक्रियता दिखाई नहीं देती थी। यही वजह रही कि स्थानीय एजेंसियों ने पिछले काफी समय से उस पर ध्यान देना बंद कर दिया था। न ही आसपास के लोगों को उसके विषय में किसी तरह की कोई ऐसी जानकारी थी। रविवार को जब मीडिया में यह खबरें आईं तो सभी हैरान थे।
अबू बशर-नागौरी के अलीगढ़ कनेक्शन ने तब खूब छकाई थीं एजेंसियां
रविवार को इस बात का खुलासा हुआ है कि देश में सीरियल धमाकों के बाद आतंकी अबू बशर अलीगढ़ रुककर गया था। मध्य प्रदेश में गिरफ्तार दूसरे आतंकी नागौरी के भी अलीगढ़ से कनेक्शन हैं। उस समय दिल्ली में गिरफ्तार एक आतंकी के पास से तो दिल्ली आने तक का टिकट भी मिला था। इन तमाम जानकारियों के आने के बाद एजेंसियों की निगाह लंबे समय तक अलीगढ़ पर टिकी रहीं। सिमी के पुराने तमाम कनेक्शन खंगाले गए। मगर अब्दुल्ला दानिश का इन तीनों से कोई कनेक्शन एजेंसियां नहीं जुटा पाई थीं।
सिमी की मैगजीन का मुख्य संपादक रहा है
वर्ष 1985 में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से अरबी में एमए किया था। यहां पर सिमी कार्यकर्ताओं के संपर्क में आकर ये कट्टरपंथी बन गया। सिमी में शामिल होने के बाद ये सिमी के कार्यक्रमों में शामिल होने के अलावा युवकों को जिहादी बनाने लगा। तत्कालीन सिमी अध्यक्ष अशरफ जाफरी ने इसे सिमी की मैगजीन के हिंदी वर्जन का संपादक बना दिया था।
अब्दुल्ला कई आतंकियों के संपर्क में था
दिल्ली पुलिस अधिकारियों के अनुसार जामिया नगर से फरार होने के बाद अब्दुल्ला अलीगढ़ गया। अब्दुल्ला ने आतंकी अबदुश सुभान कुरैशी उर्फ तौकीर दूसरे आतंकी अबू बशर से मिला था। अब्दुल्ला ने इनको भारत सरकार के खिलाफ देश विरोधी गतिविधियों के लिए उकसाया था। इन दोनों आतंकियों ने अपने अन्य साथियों की मदद से वर्ष 2008 में सीरियल बम धमाके किए थे। सीरियल बम धमाकों के बाद अबू बशर अलीगढ़ में अब्दुल्ला के घर रुका था। अब्दुल्ला के कहने पर ही इन आतंकियों ने केरल में सिमी के आतंकी ट्रेनिंग कैंप शुरू किए थे। अब्दुल्ला ने स्वीकार किया है कि वह यूपी, एमपी व गुजरात में जाकर युवकों को जिहादी बना चुका है।
ये है इतिहास, अलीगढ़ मुख्यालय पर 2001 से ताला
अलीगढ़। स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया (सिमी) की स्थापना जमात-ए-इस्लामी की छात्र इकाई के रूप में अप्रैल 1977 में अलीगढ़ में हुई। उस समय शमशाद मार्केट पर कार्यालय बनाकर प्रो. मो.अहमदुल्लाह सिद्दीकी ने इसे खड़ा किया। इसे एसआईओ (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाइजेशन) का दूसरा रूप बताया गया। मगर जैसे-जैसे देश में सांप्रदायिक घटनाओं और देश विरोधी गतिविधियों में 1984 के बाद सिमी कार्यकर्ताओं के नाम सामने आने लगे तो इस पर प्रतिबंध की आवाज उठने लगी। पुलिस भी इस संगठन के खिलाफ काम करने लगी। इसके बाद से ही इसके शमशाद मार्केट कार्यालय पर लोगों की आवाजाही कम होने लगी। मगर 2001 में प्रतिबंध के बाद से वहां ताला लग गया। हालांकि 2008 में अल्प समय के लिए प्रतिबंध हटा, लेकिन वह फिर बरकरार हो गया। इसके आखिरी राष्ट्रीय अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही को प्रतिबंध के बाद जेल जाना पड़ा और जेल से रिहा होने के बाद वह आजमगढ़ में अपना क्लीनिक चलाते हैं। शमशाद मार्केट मुख्यालय पर आज भी ताला लगा हुआ है और खुफिया टीम की निगरानी रहती है। सबसे खास बात है कि जो उस समय के सक्रिय सदस्यों की सूची खुफिया तंत्र के पास थी, उनमें ज्यादातार या तो बुजुर्ग हो गए हैं, या फिर उनकी सक्रियता खत्म हो गई है। मगर बाद में इसका कटरपंथी ग्रुप इंडियन मुजाहिदीन से जुड़कर काम करने लग गया था।
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आतंकियों के ठिकाने के रूप में कुख्यात है अलीगढ़
यह कोई नई बात नहीं है। अलीगढ़ आतंकियों के छिपने के ठिकाने के रूप में पहले से कुख्यात है। अगर हम यहां के इतिहास पर गौर करें तो सिमी की स्थापना के अलावा, कश्मीर से आने वाले कपड़ों में एके-47 छिपाकर लाना, नागौरी द्वारा अलीगढ़ की मदद से राजस्थान व मध्य प्रदेश में ब्लास्ट प्लान करने के साक्ष्य मिलना, आतंकी का अलीगढ़ रुककर जाना, कानपुर ट्रेन धमाकों के बाद यूपी एटीएस द्वारा एनकाउंटर में मारे गए व पकड़े गए आतंकियों का घटना से कुछ पहले अलीगढ़ में छिपकर रहना आदि प्रकरण हैं जो यह जाहिर करते हैं कि अपने इस शहर में आतंकियों को पनाह मिलती है।
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