अलीगढ़। यह तो खुद अपहरणकर्ताओं ने ही साफ कर दिया कि जिस बच्चे का अपहरण हुआ, उसका अपहरण नहीं होना था, बल्कि खुद प्रमुख बिल्डर योगेंद्र सिंह उर्फ बंटी जादौन के बेटे का अपहरण होना था। मगर गलती उस बच्चे से हो गई, जिसकी मदद से अपहरणकर्ताओं ने यह अपहरण कराया था। मगर जब बदमाशों को गलती का अहसास हुआ तो उन्होंने रेंसम की रकम एक करोड़ से घटाकर पहले पचास लाख की, फिर बीस और अंत में दस लाख रुपये कर दी। साथ ही साफ कर दिया कि बच्चा तभी मिलेगा, जब रुपये मिलेेंगे। अन्यथा बच्चे को मार देंगे। ऐसे में बड़ा सवाल है कि आखिर बदमाशों के इतने फूलप्रूफ इंतजाम और पुलिस की तगड़ी किलेबंदी के बीच बिना फिरौती दिए और बिना पुलिस की मदद से बच्चा कैसे मिल गया। इस बात को कोई हजम नहीं कर पा रहा। साथ ही बड़ी चर्चा यह भी है कि निश्चित तौर पर यह काम किसी ऐसी रंजिश से जुड़ा है कि जो इस परिवार से खुन्नस खाए हो और चाट की ढकेल लगाने वाले की मदद से घटना को अंजाम दिलाया गया हो।
ऐसे लिखी अपहरण की कमजोर स्क्रिप्ट
क्वारसी पुलिस और खुद बिल्डर बंटी जादौन की बात पर गौर करें तो शुरुआत में कतई अंदाजा नहीं था कि इस अपहरण को उनके आसपास के लोगों ने अंजाम दिया है। मगर बच्चे की बरामदगी के बाद तस्वीर साफ हो गई कि मूल रूप से बदायूं बहजोई निवासी विजय पाल सिंह उनकी कॉलोनी में पार्क के बाहर ही चाट का ठेला लगाता है। विजय पाल सिंह फरार आरोपी हरिओम गुर्जर का रिश्तेदार है। विजयपाल भी फरार चल रहा है। विजयपाल का करीब 12 साल का बेटा भुवनेश भी पिछले पंद्रह दिन से अचानक पार्क में हमारे बच्चों के साथ खेलने लगा था और इतना घुल मिल गया था कि बच्चों से उसकी दोस्ती हो गई थी। इसी दोस्ती के चलते घटना वाले दिन वह अभय को चिप्स खिलाने के बहाने पार्क से बाहर लाया, जहां पहले से बाइक पर दो लोग मौजूद थे, जो अभय व भुवनेश को अपने साथ ले गए। वह सीधे उसे बहजोई में रेलवे स्टेशन के पास एक किराये के कमरे पर लेकर पहुंचे, जो उन्हाेंने प्लानिंग के तहत कुछ दिन पहले ही किराये पर लिया। इसी बीच पहली रेंसम कॉल की गई। क्रमवार चार कॉल की गईं। हर कॉल में यही कहा गया कि रकम का इंतजाम कर लो, जल्द ही समय व स्थान बता दिया जाएगा। मगर पहली बार जब बंटी से अपहरणकर्ता हरिओम की बात हुई और स्पष्ट हुआ कि जिस बच्चे को उठाया गया है, वह बंटी का नहीं, साले का है तो फिरौती की रकम एक करोड़ से घटकर 50 लाख पहुंची और धीरे-धीरे घटती रही। 9 की सुबह आखिरी कॉल जब आई, तब बंटी सोये हुए थे, इसलिए फोन नहीं रिसीव कर सके। इसी बीच किराये के मकान से भुवनेश व अभय को हटाकर कटरी में शिफ्ट किया गया।
खुद की चालाकी से ही बच गया अभय
अभय की जुबानी इस अपहरण की कहानी सुनें तो चाट की ढकेल वाले का बेटा भुवनेश उनके साथ खेलता था। वह ट्यूशन से आने के बाद जब पार्क में खेल रहा था तो उसी की बातों में आकर उसके साथ चला गया। जहां उसे रखा गया, वहां भुवनेश भी साथ ही था और उससे यही कहा गया कि घुमाने ले जा रहे हैं। पहले तो वह कुछ समझ नहीं सका। खाने पीने की भी कोई समस्या न थी। मगर एक रात के बाद जब उसने घर जाने की जिद की और उसने हरिओम को फिरौती की रकम, अपहरण जैसी बातें फोन पर करते सुना तो वह समझ गया कि उसे अपहरण कर लाया गया है। इस पर वह 8 की रात को खूब रोया भी। रात में हरिओम ने शराब के नशे में उसे रोने पर मारने की धमकी दी तो वह चुप हो गया। 9 की सुबह यह लोग एक बाइक से उसे व भुवनेश को लेकर चले। मगर वह सब कुछ चुपचाप देखता रहा। एक स्थान पर जंगल में बाइक का पेट्रोल खत्म हो गया। मगर वहां कोई साधन नहीं था। इस पर बाइक लेकर हरिओम वहीं रह गया, जबकि भजनलाल उसे व भुवनेश को लेकर पैदल चल दिया। कई घंटे पैदल चलने के बाद जब अभय जब थक गया तो शाम हो चुकी थी और उस मार्ग पर कोई वाहन भी नहीं था। तभी एक साइकिल सवार से मदद लेकर भुवनेश व अभय को भजनलाल ने बैठा दिया। रास्ते में अभय ने साइकिल सवार को पूरी बात बताई। तब साइकिल सवार ने गांव के बाहर मंदिर पर पुजारी आदि की मदद लेकर बच्चे को बचाया और भजनलाल को दबोच लिया। भुवनेश से पुलिस पूछताछ कर रही है। उसके एक भाई पर भी पुलिस को शक है। इसके अलावा कुछ लोग मैरिस रोड पर खाने का होटल चलाते हैं, वह भी इस घटना में शक के दायरे में हैं।
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-इस पूरे मामले में कहीं किसी तरह की रंजिश या रकम देकर बच्चा वापसी की बात सही नहीं है। उनकी कॉलोनी में किराये पर रहने वाले कुछ लोगों ने रकम वसूली के लिए इस घटना को अंजाम दिया। पुलिस की मदद से बच्चा मिल गया। इसके लिए वह पुलिस के शुक्रगुजार हैं।-योगेंद्र सिंह बंटी जादौन बिल्डर
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क्वारसी इंस्पेक्टर की गलती से छिना गुडवर्क
इस पूरे मामले में शुरू से क्वारसी इंस्पेक्टर की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। शुरू से इस मामले में सर्विलांस टीम लोकेशन के आधार पर अपहरणकर्ताओं को तलाशने में जुटी थी। हालांकि तीन नंबरों से फेक आईडी के नंबरों से कॉल की जा रही थी। मगर पहली लोकेशन रामघाट और दूसरी लोकेशन बहजोई की मिली। उसी लोकेशन के आधार पर पुलिस टीम लगी रही। इधर, रात नौ बजे ही अहार पुलिस ने इंस्पेक्टर क्वारसी को बच्चा मिलने की खबर दे दी। मगर इंस्पेक्टर ने किसी को नहीं बताया और यह गुडवर्क बुलंदशहर पुलिस के खाते में चला गया।
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नए थे किडनैपर, पर शिफ्टिंग के बाद था बड़ा नाम
पुलिस मान रही है कि बेशक इस घटना को अंजाम देने वाले अपहरणकर्ता नए थे। इसीलिए आसानी से बच्चे को लेकर सुरक्षित ठिकाने से बाहर आ गए और पकड़ में आ गए। मगर जिस ठिकाने पर बच्चा पहुंच रहा था, अगर पहुंच जाता तो दिक्कत हो जाती, क्योंकि लालू गूर्जर नाम के किसी पुराने अपहरणकर्ता पर बच्चा पहुंचने जा रहा था। अगर वहां पहुंच जाता तो शायद पुलिस के लिए बेहद मुश्किल होता।
--घटनाक्रम एक नजर में--
07 जुलाई की शाम 6 बजे बच्चे का अपहरण
07 जुलाई की रात 9 बजे करीब रेंसम कॉल
08 जुलाई की शाम 4 बजे तक कुल चार कॉल
09 जुलाई की सुबह 4 बजे कॉल, रिसीव नहीं
09 जुलाई की रात 9 बजे बच्चा सकुशल मिला
10 जुलाई की शाम 6 बजे बच्चा घर पहुंच गया