नई कहानी आंदोलन से उनके जुड़ाव, परिंदे को उस आंदोलन की प्रथम रचना घोषित किए जाने और उस आंदोलन की पृष्ठभूमि, भूमिका व प्रदेश के बारे में तब मैंने निर्मल जी से कुछ सवाल पूछे थे। लगा कि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि किस सवाल पर क्या और कितना कहना है, कब रुककर अगला सवाल पूछे जाने के लिए अनकहे कहा जाना है। उस आंदोलन से अपने जुड़ाव को याद करते हुए वे बोले- किसी एक घटना या क्षण के बारे में कहना तो मुश्किल है। जब आप किसी आंदोलन के प्रवाह में होते हैं, तब पता नहीं चलता कि आप उसका हिस्सा हैं। बाद में इतिहासकार या आलोचक सिद्ध करते हैं कि आंदोलन था। यह सोचकर मुझे फ्रेंच उपन्यास- ''ब्लैक एंड व्हाइट'' का ख्याल आ जाता है। उसका एक पात्र वाटरलू के मैदान में घूमता चला आता है ।अचानक देखता है कि वहां फ्रेंच और अंग्रेजी सेनाओं के बीच भिड़ंत हो रही है। उसे नहीं मालूम कि वह एक ऐतिहासिक घटना से गुजर रहा है।
बाद में जब लोग उसे बताते हैं तो उसे लगता है ऐसा कुछ था! मेरी हालत उस दौरान कुछ वैसी ही थी। मुझे तो बाद में पता चला कि मैं ''नई कहानी'' आंदोलन में शामिल था। उन दिनों साहित्य का केंद्र दिल्ली नहीं था। नई कहानी के बड़े लेखक इलाहाबाद में रहते थे। नई कहानी आंदोलन की प्रमुख पत्रिकाएं वहीं से निकल रही थीं। नई कहानी के लेखकों से मेरा खास मिलना-जुलना भी नहीं होता था। मेरी मित्र-मंडली कवियों की थी-नरेश मेहता, रघुवीर सहाय, मनोहरश्याम जोशी...। विरोधाभास ही जान पड़ता है यह कि मेरा मित्र-मंडल कवियों का ही अधिक था, कहानीकारों का नहीं। छप्पन-सत्तावन में ''कल्चरल फोरम'' नाम से एक संस्था बनी थी जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ करते थे। उस संगठन को चलाने में देवेंद्र ने मुख्य भूमिका निभाई थी। कृष्ण बलदेव वैद्य, भीष्म साहनी, जोशी आदि सब लोग उसमें आया करते। मैं भी वहाँ कहानियां सुनाता था, सुनता था।
अप्रकाशित रचनाओं के संग्रह का विमोचन 3 अप्रैल को
निर्मल वर्मा के असंकलित और प्रकाशित संग्रह का विमोचन उनकी जयंती पर 3 अप्रैल को होगा। साहित्यकार डॉ. प्रेमकुमार ने बताया कि इसका संपादन उनकी पत्नी गगन गिल ने किया है। उन्होंने कहा कि साहित्य को लेकर उनकी निर्मल वर्मा की पत्नी से बातचीत होती है।