कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे शहर को अगर कोई सांसें दे रहा है, तो वो हैं यहां के सदियों पुराने बरगद के पेड़। कभी शहर की रौनक बढ़ाने वाले इन वट वृक्षों की संख्या भले ही घटकर आधी रह गई हो, लेकिन आज भी ये शहरवासियों के लिए कुदरती ऑक्सीजन सिलिंडर का काम कर रहे हैं। हालांकि, इंसानी दखल और अन्य कारण इनके वजूद के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।
तेजी से बढ़ती आबादी और लगातार होते निर्माण कार्यों की बलि चढ़कर शहर में बरगद के पेड़ों की संख्या आधी रह गई है। कभी अलीगढ़ के शहरी क्षेत्र में 500 से अधिक बरगद के पेड़ हुआ करते थे, जो अब सिमटकर 250 के करीब ही बचे हैं।
वन विभाग के रेंजर गौरव कुमार ने बताया कि जिले में 12 अति प्राचीन पेड़ों को ''हेरिटेज ट्री'' (धरोहर वृक्ष) की श्रेणी में रखा गया है, जिनमें पीपल और बरगद शामिल हैं। तीन हेरिटेज पेड़ शहरी क्षेत्र में हैं, जिनमें से दो नगर निगम परिसर में और एक स्टेट बैंक तिराहे पर शान से खड़ा है। इसके अलावा एक ऐतिहासिक बरगद का पेड़ अतरौली के बरहद मंदिर परिसर में भी है।
एक पेड़, चार जिंदगियां, बरगद के चमत्कारी वैज्ञानिक फायदे
डीएस कॉलेज की प्राणी विज्ञान विभाग की डॉ. पूजा सिंह ने बरगद के उन वैज्ञानिक फायदों को साझा किया, जो इसे पर्यावरण का सुपरहीरो बनाते हैं। एक अकेला बरगद का पेड़ प्रतिदिन करीब 275 लीटर ऑक्सीजन छोड़ता है, जो 4 लोगों की रोज की जरूरत को पूरा करने के लिए काफी है। यह पेड़ हर दिन 22 किलो तक खतरनाक कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक तत्वों को खुद में सोख लेता है। इसकी घनी और विशाल छाया के नीचे का तापमान आसपास के वातावरण से 5 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है।
500 वर्षों से भी अधिक समय तक जीवित रह सकता है
डॉ. पूजा सिंह ने एक बड़ी चिंता जताते हुए नागरिकों से अपील की है। उन्होंने बताया कि बरगद की जड़ें बेहद पुरानी होती हैं, जिनमें फंगस (कवक) लगने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। धार्मिक आस्था के चलते कई लोग इन पेड़ों की जड़ों में आटा, चीनी या अन्य खाद्य सामग्री डाल देते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह बेहद खतरनाक है, क्योंकि खाने-पीने की चीजों से जड़ों में फंगस बहुत तेजी से फैलता है, जिससे पेड़ अंदर ही अंदर खोखला होकर समय से पहले मर जाता है। अगर हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को साफ हवा देनी है, तो इन पेड़ों को पूजने के साथ-साथ वैज्ञानिक तरीके से इनका संरक्षण भी करना होगा।