न्यूज डेस्क, इकराम वारिस, अलीगढ़।
यूं तो पद्मश्री काजी अब्दुल सत्तार इस दुनिया से रुख्सत हो चुके हैं, लेकिन उनकी एक-एक बात याद कर उनके खिदमतदार (सेवक) नादिर और आमिर उदास और मायूस हो जाते हैं। कहते हैं कि उनकी डांट तो डांट गाली भी प्यारी लगती थी। अब वो डांट और बातें सुनने को नहीं मिलेगी। इसके लिए वो तरसेंगे।
एक दशक से ज्यादा काजी साहब के सेवक रहे नादिर कहते हैं कि मैं भी उनकी गालियां और डांट-फटकार सुनने का आदी हो चुका था। उनके बुलाने पर फौरन हाजिर नहीं हुआ तो गाली देने लगते थे। पर उनकी गाली भी प्यारी लगती थी।
दरअसल, उनकी गाली में न दिखने वाला अपनत्व था। मैंने हमेशा उन्हें (काजी सत्तार) अपने बाप का दर्जा दिया। वे भी मुझे अपने बेटे जैसा प्यार दिया। उनका गुस्सा पल भर का था। आमिर बताते हैं कि मानो उनके सिर से बाप का साया हट गया हो। वो बहुत प्यार करते थे।
क्या मैं बंदर हूं....
इंटरव्यू के सिलसिले में तीन दफा काजी अब्दुल सत्तार के सर सैयद नगर स्थित आवास 4/1082 पर जाना हुआ है। अंतिम बार (22 जुलाई 2018 को) उनके पास इंटरव्यू ही लेेने गया था। वजह थी पद्म भूषण गोपाल दास नीरज के निधन के बाद उनकी प्रतिक्रिया, जिनका निधन 19 जुलाई को हो गया था।
20 जुलाई को काजी साहब ने कहा था कि ‘मैं अब बहुत थक गया हूं’। लिहाजा, उनकी प्रतिक्रिया नहीं मिल पायी थी। 22 जुलाई को फिर, वही सवाल किया कि अपने दोस्त नीरज जी के बारे में क्या कहना चाहेंगे, इस पर बिना लागलपेट के वे बोले ‘क्या मैं बंदर हूं, जो डमरू बजाएगा और मैं उछल-कूद करने लगूंगा’। बहरहाल, वे इस मसले पर बोलने से परहेज ही करते रहे।