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काजी की महबूबा ने इंग्लैंड में खुदकुशी कर ली थी

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न्यूज डेस्क, आशीष निगम, अलीगढ़।
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इकतालीस साल की उम्र में ही पदमश्री पाने वाले काजी अब्दुल सत्तार की मोहब्बत की दास्तान बड़ी गमगीन थी, जो उनके सीने में चालीस साल तक जज्ब रही। वो कहते थे कि एक शादी में पहली बार मिली उनकी प्रेमिका कुछ दिनों तक उनके साथ रही। बाद में भी मिलना जुलना होता रहा। कुछ दिन बाद में वो इंग्लैंड चली गई। जहां सात दिन बाद ही उसने खुदकुशी कर ली।

उसका निकाह नहीं हुआ था। वो बिन ब्याहे ही इंग्लैंड में ही चल बसी। यही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी ट्रेजडी थी। साल 2002 में आत्मकथा पर आधारित अपने उपन्यास ‘ताजम सुल्तान’ में उन्होंने इसका पूरा जिक्र किया है। इसको पूरा करने के बाद उन्होंने कहा था कि हमारी आंख कसौटी है हमारी जबान सनद है..।
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वो दावे से ये भी कहते थे कि कुर्तुल एन हैदर के बाद उर्दू में सिर्फ वही एक अफ सानानिगार हैं। बाकी सब मीडियोकर (दोयम दर्जे के) हैं। राजेंद्र यादव की मशहूर पत्रिका ‘हंस’ के दिसंबर 2002 के अंक में साहित्यकार सुरेश कुमार ने अपने एक रेखाचित्र में भी इस प्रेमकथा पर आधारित उपन्यास के बारे में बताया है।

अपनी आत्मकथा पर आधारित उपन्यास ‘ताजम सुल्तान’ की रचना करने के वाकये को काजी अब्दुल सत्तार कुछ यूं बयां करते थे ‘इसलिए कि एक अरसे से इस मौजूं पर कोई नहीं लिख रहा। मोहब्बत पर लिखना आसान काम नहीं। हम लिख सकते हैं इसलिए लिख रहे हैं और हम कोई अखबारनवीस भी नहीं कि जो कुछ आज घटा उस पर अभी आपको लिख कर दे दें।

चीजें फोड़े की तरह अंदर कहीं पकती हैं। और जब ये फोड़ा फूूूटता है। तब कहीं जाकर बड़ी रचना जन्म लेती हे। इश्क का फ ़ोड़ा हमारे भीतर चालीस साल तक पकता रहा..।’

यह रचना (यानी उपन्यास) पूरी हो चुकी है। उपन्यास के अंदर की कहानी को बताते हुए बोले.. लेकिन उसका (कहानी की प्रेमिका) निकाह नहीं हुआ है। हर समय उस पर पहरा रहता है। उसके रिश्तेदार जो हमारे भी दूर के रिश्तेदार थे, के यहां एक शादी में उससे मेरी मुलाकात होती है और हम दोनों मोहब्बत में गिरफ्तार हो जाते हैं। वह खूबसूरत नहीं थी लेकिन बला की कशिश थी उसके जिस्म में। मेरी शादी हो चुकी थी।

राजकुमारी (कहानी की प्रेमिका) उम्र में तो बड़ी थी ही, हैसियत में और भी बड़ी थी। बाइस दिन तक हम लोग साथ रहे। उसके बाद भी हम लोग किसी न किसी बहाने मिलते रहते। फि र अचानक उसे इंग्लैंड जाना पड़ा। जहां सात दिन बाद उसने खुदकुशी कर ली। ये हमारी जिंदगी की ट्रेजडी है। चालीस साल तक हम इस दर्द को सीने में छिपाये घूमते रहे। हमने इसे ऑटोबॉयोग्राफ ी नहीं बनाया, ऑटोबॉयोग्राफि कल नाविल की शक्ल दी है।

इश्क इतना हल्का और आसान लफ्ज नहीं है। यह तजुर्बा जिंदगी में सिर्फ एक बार होता है और ये किसी भी उम्र में हो सकता है। यह मामला सिर्फ जवानी तक महदूद नहीं है। आपकी जिंदगी में बहुत सी औरतें ऐसी हो सकती हैं, जिनके साथ आप हमबिस्तर हुए हों, लेकिन ये जरूरी नहीं है कि उनमें से किसी के साथ वैसा इश्क हो, जो जुनून की हद तक ले जाता है। हो सकता है ऐसा इश्क बहुत बाद में जाकर किसी से हो जाए। इसमें करने के लिए कुछ नहीं होता। बस हो जाता है। फि र आप जिंदगी भर उसमें डूबे रहते हैं।

प्रेम के साथ जुड़े हुए किसी भी विश्लेषण को काजी साहब नहीं मानते थे। वह कहते थे.. ‘‘क्या होता है..? प्लेटोनिक लव..? (किसी के सीने में जज्ब वो प्रेम जो कभी नुमाया न हो) ये सब बेवकूफ ी की बातें हैं। इश्क का दायरा बहुत बड़ा है। इश्क तो हम बहुत से लोगों से करते हैं। मां है.. । बहन है..। बीबी है..। बेटी है..। महबूबा है..। पांच रंग तो इश्क के यही हैं। बाकी आप देख लीजिए..। बीबी और महबूबा के साथ जो इश्क होता है। उसके शेड्स अलग अलग होते हैं।

और जरा गौर कीजिए... महबूबा के साथ आपका जो इश्क है। उसकारंग एक दम जुदा होगा। वह जो इश्क होता है। जिसमें एक आशिक जान दे भी सकता है। जान ले भी सकता है। वह इश्क का सबसे ऊंचा पायदान है। ऐसा इश्क किसी एक के साथ ही होता है।’’

इस उपन्यास को लिखते वक्त हफ्तों रोया हूं। एक दिन पूरी रात रोता रहा। तब कहीं जाकर एक जुमला लिख पाया..‘भैया सरकार तुम अगर इतने अच्छे न होते तो कितना अच्छा होता। ये जुमला डेथ बेड पर माशूका अपने आशिक से कहती है।’

1-वर्ष 2002 में जब देश गुजरात के गोधरा दंगों की आग में झुलस रहा था। तब वह अपनी प्रेम कहानी को शब्दों में पिरो रहे थे। वर्ष 2005 में ‘ताजम सुल्तान’ प्रकाशित होकर आया और इसने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया।
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2-वर्ष 1933 में जन्मे काजी ने उपन्यास के बाबत सुरेश कुमार को दिए इंटरव्यू में कहा था उन्होंने चालीस साल तक अपनी प्रेम कहानी को सीने में जज्ब रखा। वर्ष 2002 में इसको अलफ ाज दिए। यानी प्रेम कहानी 60 के दशक में शुरू हुई।
3-इस उपन्यास का नाम ताजम सुल्तान कहानी की नायिका पर रखा गया, जिसका पूरा नाम जुम्मन आरा ताज सुल्तान था जिसे नायक प्यार से ताजम सुल्तान पुकारता था।
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