लोकसभा चुनाव 2019 में अपने पक्ष में माहौल करने में पूरी ताकत झोंक रही भाजपा के निष्ठावान वरिष्ठ कार्यकर्ता राजेंद्र वार्ष्णेय चीफ के साथ हुई सख्ती पार्टी की किरकिरी की वजह बनती जा रही थी। इसीलिए संगठन और तीन विधायकों ने इस मामले में तत्परता दिखाई और ‘लखनऊ’ तक बात करने के बाद डीएम-एसएसपी से मुलाकात की। बंद कमरे में हुई मुलाकात के बाद जेल जाने की ‘हार’ को रिहाई की ‘जीत’ का रंग दिया गया। चीफ रिहा तो हो गए लेकिन दो-दो मामलों की जमानत कराने और उनकी पैरवी करने का बोझ अभी उनके सिर पर है। अगर समझौता नहीं हुआ तो अदालत के ही चक्कर लगाते रहेंगे।
इस प्रकरण के बाद प्रशासनिक अधिकारी भी खासे तनाव में हैं क्योंकि लगातार भाजपा कार्यकर्ता अपनी ही सरकार में ‘शिकार’ हो रहे हैं। जिससे सरकार की त्यौरियां चढ़ने लगी हैं। छह फरवरी को एटा में होने वाले बूथ सम्मेलन में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के समक्ष भी ये प्रकरण उठाने की तैयारी हो रही हैै। जहां वो बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं को सीधे संबोधित करेंगे।
वार्ष्णेय समाज से जुड़े चीफ दशकों से पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता से नेता तक बने। संगठन में प्रदेश मंत्री तक रहे। प्रदेश में 2017 में योगी सरकार बनने के बाद उनकी सक्रियता बढ़ी। उत्साहित चीफ को शायद ये अंदाजा नहीं था एक पैरवी में वो अपनी ही सरकार में जेल पहुंच जाएंगे। भाजपा के स्थानीय नेताओं ने इन्हीं समीकरणों को साधने के लिए चीफ की रिहाई को जीत का रंग दिया जिससे कार्यकर्ताआें की कड़ी आलोचना से बचा जा सके क्योंकि इस प्रकरण के बाद से सोशल मीडिया पर सभी नेता निशाने पर आ गए थे। एक बात और.. जब सोशल मीडिया पर चीफ को लेकर सांसद बनाने तक के नारे बुलंद होने लगे तो नेताओं को लगा इस प्रकरण का पटाक्षेप कराना जरूरी है वरना उनके नारे कौन लगाएगा..?
रिहाई से पहले डीएम-एसएसपी से मिले थे तीन भाजपा विधायक
राजेंद्र वार्ष्णेय चीफ की रिहाई से पहले विधायक संजीव राजा, अनिल पाराशर और ठा. रवेंद्र पाल सिंह जिलाधिकारी चंद्रभूषण सिंह से मिलने पहुंचे और उनके पूरे प्रकरण से अवगत करा कर चीफ का पक्ष रखा। बंद कमरे में हुई इस बैठक के बाद भी चीफ का रिहाई का रास्ता साफ हो सका। क्योंकि चीफ ने खुद अपनी जमानत कराने से इंकार कर दिया था। विधायक डीएम से मिलने के बाद एसएसपी से भी मिले और वहां भी पैरवी की।