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अल्लाह की खुशी के लिए एतकाफ में बैठे रोजेदार

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
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एतकाफ (ठहरना या रुकना) को इस्लाम में फर्ज का दर्जा हासिल नहीं है। मगर, सुन्नत और वाजिब जरूर है। मंगलवार (20वां रोजा) की अस्र की नमाज (शाम पांच बजे से छह बजे तक) एतकाफ के लिए रोजेदार मस्जिद में बैठ गए।

मस्जिद के आसपास के ही लोग जो रोजेदार होते हैं, वही एतकाफ में बैठते हैं। इनकी तादाद पांच-छह से ज्यादा भी हो सकती है। एतकाफ में बैठने वाले को रोजा रखना जरूरी है। रमजान महीने को दस-दस रोजे को अशरे में बांटा गया है।
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दस दिनों तक रोजेदार मस्जिद में कुरान की तिलावत और इबादत में मशगूल रहेंगे। यह रोजेदार तभी मस्जिद से बाहर निकलेंगे, जब ईद का चांद निकल आएगा।

क्या है एतकाफ
एएमयू के सुन्नी थियोलॉजी विभाग के शिक्षक मुफ्ती डॉ. मोहम्मद जाहिद खान ने बताया कि किसी एक जगह अल्लाह की रजा (खुशी) के लिए बैठना। रमजान के आखिरी दस रोजे तक मस्जिद में पुरुष व घर के एक कोने में महिला एतकाफ में बैठ सकती है।

उन्होंने कहा कि पैगंबर मोहम्मद मुस्तफा (सअ) अपनी जिंदगी के आखिरी दो-तीन साल मस्जिद-ए-नबवी में एतकाफ में बैठे थे। उन्हीं से एतकाफ की शुरुआत हुई।
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