पत्थर पर उभरा मछली का जीवाश्म।
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अब से ठीक 57 साल पहले अचानक हाथ लगे 13.6 करोड़ वर्ष पुराने मछली के जीवाश्म के राज अभी तक अनसुलझे हैं। शहर के धर्म समाज कॉलेज में मौजूद इस जीवाश्म को हासिल करने के लिए अमेरिका के भू वैज्ञानिकों की टीम 1964 में अलीगढ़ आई थी। उन्होंने इस जीवाश्म के एवज में कॉलेज के विज्ञान विभाग को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस कराने का ऑफर भी दिया था। हालांकि भारत सरकार ने तब इस जीवाश्म को उन्हें देने से इंकार कर दिया था पर अब तक इस पर गहन शोध भी नहीं कराया। अगर इस पर उचित ढंग से शोध हो तो पृथ्वी पर जीवन से संबंधित कई नई जानकारियां सामने आ सकती हैं।
धरोहर बता अमेरिका को देने से किया मना
भू विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. केएन गौड़ ने बताया कि वर्ष 1964 में दिल्ली में इंटरनेशनल साइंस कांग्रेस कांफ्रेंस थी। इसमें अमेरिका सहित दुनिया भर के भू वैज्ञानिक शामिल हुए। इस दुर्लभ जीवाश्म के बारे में अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्र में छप चुका था। लिहाजा, अमेरिका से एक टीम अलीगढ़ भी आई। टीम ने इस जीवाश्म को अमेरिका ले जाने की इच्छा जाहिर की। इसके एवज में विज्ञान विभाग को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस कराने का वादा भी किया था। प्राचार्य ने भारत सरकार से इस बारे में राय मांगी, लेकिन सरकार ने जीवाश्म को देश की धरोहर बताकर उसे देने से मना कर दिया था।
ऐसे मिला दुर्लभ जीवाश्म
अप्रैल, 1961 में धर्म समाज कॉलेज के भू विज्ञान के विद्यार्थी शैक्षिक भ्रमण के तहत सकरी घाट, राजमहल हिल्स (बिहार) गए थे। वहां एक विद्यार्थी ने एक पत्थर को अपने शिक्षक को दिखाया, लेकिन उन्हें वह कुछ खास नजर नहीं आया। उन्होंने उस पत्थर को फेंक दिया। नीचे गिरते ही उसके दो टुकड़े हो गए। जब इन टुकड़ों को देखा गया तो उसमें मछली का जीवाश्म नजर आया। हैरत की बात यह थी कि करोड़ों वर्ष के बाद भी पत्थर में मछली का जीवाश्म मुलायम था। इसका आज भी आभास किया जा सकता है। इसके बाद अन्य सभी विद्यार्थियों को ऐसे ही पत्थर की तलाश में लगा दिया गया, लेकिन अन्य कोई ऐसा पत्थर नहीं मिला। उन टुकड़ों को शिक्षक अपने साथ ले आए। भू विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. आरएस सक्सेना थे। डॉ. सक्सेना ने इस जीवाश्म को लेकर लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. आरसी मिश्रा से चर्चा की। उन्होंने अपने शोधपरक अध्ययन के बाद जीवाश्म के दुर्लभ होने की पुष्टि की। इसको कॉलेज में ही ‘झिंगरेनिया रूनवाली, सक्सेना एंड मिश्रा’ नाम मिला था। उस वक्त वंशगोपाल झिंगरन कॉलेज के प्राचार्य और उत्तर प्रदेश मत्स्य विभाग के निदेशक रूनवाल थे।
मछली का जीवाश्म 13 करोड़ 60 लाख वर्ष पुराना है। इतना दुर्लभ जीवाश्म डीएस कॉलेज के अलावा कहीं नहीं है। इसमें मछली के मुलायम अंग आभास किए जा सकते हैं। अमेरिका की टीम ने इसकी खासियत को देखते हुए इस जीवाश्म को मांगा था।
-डॉ. वाईपी सिंह, विभागाध्यक्ष, भू विज्ञान विभाग डीएस कॉलेज