हथियार तस्करी के जिस बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ है, उसकी पटकथा रातों-रात नहीं लिखी गई। इसकी शुरुआत लगभग पांच महीने पहले 24 दिसंबर 2025 को हुई थी, जब एएमयू के शिक्षक राव दानिश की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड ने पुलिस को एक ऐसे गहरे जाल की तरफ इशारा कर दिया था, जिसके तार अब जाकर पूरी तरह बेनकाब हुए हैं।
राव दानिश हत्याकांड के बाद जब पुलिस ने मुख्य आरोपियों जुबैर, फहद और यासिर की तलाश शुरू की, तो जांच टीम को अहसास हुआ कि यह केवल एक हत्या का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे हथियारों की सप्लाई करने वाला एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा है। पुलिस इन आरोपियों की गतिविधियों और उनके मददगारों पर नजर रख रही थी। इसी बीच सराय हकीम में हुई फायरिंग की घटना ने पुलिस की सतर्कता को और बढ़ा दिया। पुलिस यह समझने की कोशिश कर रही थी कि इन अपराधियों को अत्याधुनिक पिस्टल और कारतूस कहां से मिल रहे हैं। जांच के दौरान पुलिस के हाथ एक ऐसा वीडियो लगा, जिसने इस पूरे मामले का रुख ही बदल दिया। पुलिस सूत्रों के मुताबिक वीडियो में गिरोह के सदस्य हथियारों की डीलिंग करते, उनकी नुमाइश करते और कीमतों को लेकर सौदेबाजी करते साफ नजर आए।
जब पुलिस ने इस फुटेज का तकनीकी विश्लेषण किया, तो कड़ियां जुड़ती चली गईं। वीडियो के जरिए गिरोह के ठिकानों (जैसे होटल क्राउन प्लाजा) की पहचान हुई। हथियार सप्लाई करने वाले सफेदपोश और एएमयू के छात्रों के चेहरे सामने आए। तस्करों के नेटवर्क में शामिल बिचौलियों और दिल्ली के खरीदारों की शिनाख्त आसान हो गई। इस फुटेज के आधार पर पुलिस ने कई हफ्तों तक गिरोह की हर हरकत को रडार पर रखा। जब पुलिस को पुख्ता जानकारी मिल गई कि गिरोह के सदस्य एक बार फिर डकैती की योजना बनाने और हथियारों की बड़ी खेप पहुंचाने के लिए एकत्रित हुए हैं, तब संयुक्त टीमों ने छापेमारी कर 12 बदमाशों को दबोच लिया।