न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा स्वीकृत त्रैमासिक पत्रिका ‘वाङ्गमय’ द्वारा कुछ माह पूर्व समलैंगिकता पर केंद्रित अंक प्रकाशित किया गया था। इस पत्रिका से एएमयू एवं डॉ. बीआर अंबेडकर आगरा यूनिवर्सिटी के कई शिक्षक एवं शोध छात्र जुड़े हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिकता को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा 377 को निरस्त कर दिया गया है। अब यह अपराध की श्रेणी में नहीं है। देश के अनेक बुद्धिजीवी इसकी लड़ाई कलम से लेकर सड़क तक लड़ रहे थे।
एएमयू के शोध छात्र अकरम हुसैन कादरी ने बताया कि वरिष्ठ आलोचक डॉ. वेद प्रकाश अमिताभ के आवास पर समलैंगिकता पर केंद्रित अंक पर परिचर्या हुई थी, जिसमें साहित्यकार भरत सिंह भी मौजूद थे। उस समय बुद्धिजीवियों द्वारा इन अपेक्षित वर्ग के लोगों को इंसाफ मिलने की उम्मीद जतायी गयी थी, जो अब जाकर पूरी हुई है।
अकरम हुसैन कादरी कहते है कि सुप्रीम कोर्ट ने इंसाफ किया है। यह समाज, देश एवं मानवता के लिए आवश्यक था। अकरम हुसैन ने बताया कि पत्रिका के संपादक डॉ. मुहम्मद फिरोज खान कानपुर स्थित हलीम पीजी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। परिचर्या में एएमयू के वीमेंस कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर एवं अनुसंधान पत्रिका की संपादक डॉ. शगुफ्ता नियाज, डॉ. आलोक कुमार एवं शोध छात्र मनीष कुमार आदि भी शामिल हुए थे।
हर व्यक्ति को गरिमा से जीने का हक
एसवी कॉलेज के विधि छात्र एवं विश्व हिंदू परिषद से जुड़े विशाल वार्ष्णेय ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने हर व्यक्ति को गरिमा से जीने का हक प्रदान किया है।