अजीम शायर मिर्जा गालिब की 217वीं जयंती पर बज्म-ए-गालिब समिति और आगरा बुक क्लब के सहयोग से शनिवार को ग्रांड होटल में गजल और शेर-ओ-शायरी की महफिल सजी। गायक सुधीर नारायण ने ‘कोई दिन गर जिंदगानी और है, हमने जी में आपने ठानी और है’ ने शेर पढ़ा तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। शेर-ओ-शायरी के शौकीनों ने भरे महफिल में हर शेर पर गायकों को दाद मिली।
हेमा शर्मा ने ‘ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता और अगर जीते रहते तो यही इंतजार होता।’ पेश किया। माना शुक्ला, सागर, निखिल वर्मा ने ग्रुप में ‘मैं उन्हें छेड़ूं और कुछ न कहें, चल निकलते जो मय पिये होते।’ गजल गाई। सुधीर नारायण ने ‘दर्द मिन्नत कशे दवा न हुआ, मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।’ शीलत चौहान ‘न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता।’ एक के बाद के गायकों ने शिद्दत से गालिब के शेरों को पढ़ा।
इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ गालिब की तस्वीर पर चिराग रोशन कर किया गया। इसमें सपा राष्ट्रीय महासचिव व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजी लाल सुमन, समिति के संरक्षक अरुण डंग, सीईओ सोनम यंगडोल, रक्षा संपदा अधिकारी सुब्रत पाल, डॉ नसरीन बेगम, आगरा बुक क्लब की अध्यक्ष डा. शिवानी चतुर्वेदी शामिल थीं। इस मौके पर उमर तैमूरी, सैयद अजमल अली शाह, नवेद अतहर सिद्दीकी आदि मौजूद रहे।
अभिनेता फारूख शेख को दी श्रद्धांजलि
मशहूर फिल्म अभिनेता फारूख शेख की पहली पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी गई। अरुण डंग ने कहा कि उनका पहला सफर आगरा से शुरू हुआ और आखिरी भी। वह बहुत सरल स्वभाव के और साहित्य प्रेमी थे।
इनका फोटो सिटी डेस्क में अरुण के नाम से है
‘हर समस्या का समाधान हैं गालिब’
मेरी बेचैनी की तसल्ली, भूख की खुराक, सवाल का जवाब, समस्या का समाधान हैं गालिब। दीवान-ए-गालिब को जुबान पर रटने वाले बजम-ए-गालिब समिति के संरक्षक अरुण डंग ने कहा कि बचपन से ही गालिब को पढ़ने का शौक रहा है। रिटायर्ड आर्मी अफसर बृजेंद्र सियाल भी गालिब के बहुत दीवाने थे। उन्होंने दीवान-ए-गालिब को पत्थरों पर तराशा है। कुछ पत्थर मेरे पास भी थे, जिन पर गालिब का हर शेर तराशा गया है। अब यह सभी पत्थर दिल्ली अहवान-ए-गालिब में रखे हैं। उनके हर शेर में जिंदगी छुपी है। उन जैसा शायर अब नहीं होगा। जब 1997 के ताज महोत्सव में पहली बार मुशायरे को शामिल किया, तो उसे गालिब को समर्पित किया गया।