नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने यमुना के डूब क्षेत्र के अनुचित चिह्निकरण और पिलर लगाए जाने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और शहर प्रशासन की जमकर खिंचाई की है। उसने कहा कि नदी के किनारे के 85 फीसदी निर्माण ढहाए जाने लायक हैं।
एनजीटी के चेयरपर्सन जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से उपस्थित वकील से कहा कि वह सरकार से स्पष्ट निर्देश लेकर आएं कि क्या वह नए सिरे से डूब क्षेत्र का निर्धारण करना चाहती है या नहीं। मामले की अगली सुनवाई 22 नवंबर को होगी। पीठ ने कहा कि स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट में सरकारी विभागों के कामकाज में भारी खामियों की बात उजागर हुई है। डूब क्षेत्र का अनुचित चिह्निकरण गंभीर मसला है। इसमें कहा गया है कि यमुना नदी के डूब क्षेत्र से विभिन्न रियल एस्टेट परियोजनाओं की दूरी मापने में भी काफी गड़बड़ी की गई है। दावे के उलट यमुना के डूब क्षेत्र में स्थित 85 फीसदी इमारतें ढहाए जाने लायक हैं। एनजीटी ने स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट पर मामले के अन्य पक्षों और विभिन्न रियल एस्टेट कंपनियों से दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। पीठ डीके जोशी की याचिका पर सुनवाई कर रही है। पिछले दिनों जोशी का निधन हो गया। उनकी याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई बिल्डरों ने डूब क्षेत्र और यहां तक कि नदी में ही इमारतें खड़ी कर दी हैं। बताया जा रहा है कि डूब क्षेत्र में ऐसी 46 बहुमंजिला इमारतें और कालोनियां हैं, जिन पर गाज गिर सकती है।