रंगमंच शब्दों का नहीं, बल्कि उन खामोशियों का भी खेल है जो दो संवादों के बीच छूट जाती हैं। हिंदी के आधुनिक रंगमंच के पुरोधा मोहन राकेश की यह टिप्पणी भाषा और संवाद की उस गहराई तक ले जाती है, जहां एक रंगकर्मी बिना कुछ कहे भी सबकुछ बयां कर देता है। यह शहर सिर्फ ऐतिहासिक स्मारकों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक और रंगमंच (थियेटर) परंपरा के लिए भी जाना जाता है। इसमें 400 साल से भी अधिक पुरानी लोक नाट्य विधा भगत का अहम स्थान है। हालांकि बदलते दौर में रंगमंच की यह विधा कई चुनौतियों का सामना कर रही है।
रंगलीला के संस्थापक-निर्देशक व शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल शुक्ल कहते हैं कि एक वक्त शहर में कुल 18 भगत मंडलियां थीं। स्थानीय सेठ इन मंडलियों के प्रायोजक थे लेकिन आज स्थिति यह है कि भगत करने के लिए प्रायोजक नहीं मिल रहे। ऐसे में यह नाट्य विधा संकट में है। वर्ष 2006 में मैं आगरा इस इरादे से आया था कि थियेटर को नया रूप दूंगा, जिसमें यहां की मिट्टी, संस्कृति और कला की महक होगी इसलिए मैंने भगत को चुना।
इस विधा के कई नाटक किए लेकिन यह काफी खर्चीला है। सरकार और स्थानीय प्रशासन शहर की इस सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए आगे नहीं आ रहे। शहर में होने वाले आयोजनों में स्थानीय रंगकर्मियों और संस्थाओं के बजाय बाहरी कलाकार बुलाए जाते हैं, जिससे स्थानीय कला और कलाकारों की उपेक्षा हो रही है। अनिल शुक्ल चिंता जताते हुए कहते हैं कि मौजूदा समय में जिस तरह के नाटक लिखे और मंचित किए जा रहे हैं, उनमें कोई नयापन नहीं है। यही वजह है कि दर्शक इससे किनारा कर रहे हैं।
इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा), आगरा की संरक्षक मंडल की सदस्य और संस्था की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ज्योत्सना रघुवंशी कहती हैं कि शहर में सूरसदन सभागार ही एकमात्र जगह है जहां नाटकों का मंचन किया जाता है लेकिन उसका किराया काफी महंगा हो चुका है। ऐसे में नाटकों का मंचन करना आसान नहीं है। संस्थाओं को प्रशासन की ओर से कोई मदद नहीं मिल रही। जो परंपरा पहले से चली आ रही थी, उसे भी खत्म किया जा रहा है। लाखों रुपये खर्च कर बाहर से कलाकार बुलाए जा रहे हैं। स्थानीय संस्थाओं और कलाकारों को मौका नहीं दिया जा रहा। स्थिति यह है कि रंगकर्मियों को आजीविका के लिए कोई और काम करना पड़ता है। रंगमंच में सक्रिय रहने के लिए पैसे चाहिए लेकिन वह मिल नहीं रहा। संस्थाएं अपने अकेले के दम पर कितने दिन नाटकों का मंचन करेंगी।
मदद क्यों चाहिए, टिकट बेचें और प्रोफेशनल नाटक करें : डिंपी मिश्रा
प्रसिद्ध अभिनेता और रंगकर्मी डिंपी मिश्रा ने कहा कि मैंने बीते 15 वर्षों में सूरसदन में 150 के करीब नाटकों का मंचन किया, वह भी बिना किसी सरकारी मदद के। हमारी संस्था रंगलोक ने आगरा जैसे शहर में दो हजार के करीब ऐसे दर्शक तैयार किए जो टिकट लेकर नाटक देखते हैं। यह एक उपलब्धि है। आगरा में नाटक देखने वालों का माहौल बना है लेकिन केवल प्रोफेशनल नाटक। आप अगर एक सशक्त रंगकर्मी हैं और आपकी कला में धार है तो दर्शक आपका नाटक देखने आते हैं। इस बात में कोई दम नहीं कि रंगमंच गर्त में जा रहा है या सरकार और प्रशासन मदद नहीं कर रहे। मैं पूछना चाहता हूं कि आपको मदद क्यों चाहिए। आप प्रोफेशनल नाटक करें। टिकट बेचकर पैसे जुटाएं और नाटक करें।
सोशल मीडिया ने छीन ली कला की संजीदगी
रंगकर्मी हिमानी चतुर्वेदी कहती हैं कि आज हर हाथ में मोबाइल है और हर व्यक्ति कलाकार है। 30 सेकेंड की रील का जमाना है। सोशल मीडिया ने कला की संजीदगी को छीन लिया है। एक ताल और राग को सीखने में कई साल लगते हैं तब एक कलाकार तैयार होता है लेकिन आज के युवाओं के पास नाटक देखने के लिए समय ही नहीं है। ऐसे में इस कला को कैसे जिंदा रखा जाए यह सबसे बड़ी चुनौती है।
तो और महंगी हो जाएगी सूरसदन की बुकिंग
सूरसदन सभागार का संचालन फिलहाल आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) के हाथ में है। सभागार का किराया अभी 40 हजार रुपये है। प्राधिकरण का कहना है कि इस सभागार के रखरखाव का खर्च काफी बढ़ गया है। बीते कई वर्षों से प्राधिकरण इसे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल पर देने की बात कह रहा था। प्राधिकरण की बोर्ड बैठक में इसकी मंजूरी मिलने के बाद दो बार निविदा निकाली जा चुकी है। इच्छुक संस्था के मिलने पर इसे पीपीपी मॉडल पर दे दिया जाएगा। रंगकर्मियों की चिंता यह भी है कि पीपीपी मॉडल पर संचालित होते ही सूरसदन सभागार का किराया और बढ़ जाएगा। इससे उनके सामने और बड़ी चुनौती आ जाएगी क्योंकि सूरसदन के अलावा शहर में नाटकों के मंचन के लिए कोई और स्थान नहीं है।
जानिए क्या है पारंपरिक लोक नाट्य विधा भगत
भगत मूल रूप से आगरा की अपनी 400 साल से भी अधिक पुरानी पारंपरिक लोक नाट्य विधा है। इसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी के आसपास हुई थी। शुरुआत में इसका उपयोग सामंती जमींदारों को चुनौती देने और उन पर व्यंग्य कसने के लिए किया जाता था। इसमें ठेठ राग-रागनियों पर आधारित गायन, संवाद और अभिनय का अनूठा संगम होता है। पहले यह केवल शहर के विभिन्न अखाड़ों के खलीफाओं द्वारा खेला जाता था और इसमें महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। हालांकि, अब आधुनिक रंगकर्मियों द्वारा इसका पुनरुद्धार किया गया है और इसमें सामाजिक विषयों के साथ-साथ महिलाओं को भी शामिल किया जा रहा है।
किताबों में भी आगरा के रंगमंच और गौरवशाली इतिहास का जिक्र
आगरा के रंगमंच और उसके गौरवशाली इतिहास का उल्लेख कई किताबों में भी मिलता है। प्रख्यात साहित्यकार एवं लोक-संस्कृति शोधकर्ता डॉ. सत्येन्द्र ने अपनी किताब 'ब्रज लोक साहित्य का अध्ययन' में आगरा की 400 साल पुरानी लोक नाट्य विधा 'भगत' का बहुत प्रामाणिक वर्णन किया है। वह लिखते हैं, आगरा की भगत ऊंची 'पाड़' का मनोहर रंगमंच बनाकर खेली जाती है। पाड़ का यह रंगमंच भरत मुनि के 'नाट्यशास्त्र' में वर्णित रंगमंच का स्मरण दिलाता है। वहीं, जाहिद खान की किताब तरक्की पसंद तहरीक की रहगुजर (भारत में प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन का दस्तावेज) में भारतीय रंगमंच के आधुनिक इतिहास में आगरा के योगदान को रेखांकित किया गया है।
इसमें दर्ज है कि कैसे 1942-43 के दौरान आगरा के मदन मोहन दरवाजा स्थित 'राजपूत प्रेस' से इप्टा (इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) का आंदोलन परवान चढ़ा। यह किताब विशेष रूप से आगरा के दिग्गज रंगकर्मी राजेंद्र रघुवंशी के योगदान पर प्रकाश डालती है, जिन्होंने नाटकों के जरिए साम्राज्यवाद के खिलाफ चेतना जगाई। किताब में यह भी दर्ज है कि बाल कलाकारों की प्रतिभा निखारने के लिए आगरा में 'लिटिल इप्टा' की शुरुआत की गई थी, जो उस दौर में एक क्रांतिकारी कदम था और इसका श्रेय इप्टा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ज्योत्सना रघुवंशी को जाता है। इसके अलावा प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने अपनी किताब 'आगरा बाजार' में 18वीं सदी के आगरा के तत्कालीन बाज़ार, यहां के जनजीवन, आम लोगों (ककड़ी-तरबूज बेचने वालों) और जनकवि नजीर अकबराबादी की नज्मों को रंगमंच पर पिरोया है। इस पुस्तक की भूमिका और आलेखों में यह बात प्रमुखता से दर्ज है कि कैसे आगरा शहर की गलियों और वहां के ठेठ लोकजीवन ने भारतीय आधुनिक रंगमंच को अपनी 'निजता' और एक नई 'लोकोन्मुख' शैली खोजने में मदद की।