यदि आपका कोई अपना कहने लगे, जिंदगी बेकार है, जीकर क्या करूंगा तो आप सतर्क हो जाएं, उसकी समस्या सुनें, उससे सकारात्मक बातें करें, उस पर नजर रखें। यदि वह उदास ही रहे तो मनोचिकित्सक को दिखाएं। ऐसा करने से उसे आत्महत्या से रोका जा सकता है। यह सलाह है मनोचिकित्सकों की। उनका कहना है कि कुछ लक्षणों के आधार पर उन लोगों की पहचान की जा सकती है जो आत्महत्या करने की सोच रहे हों। इन्हें बचाया जा सकता है।
विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर अमर उजाला ने शहर के प्रमुख मनोचिकित्कों से बात की। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. केसी गुरनानी ने बताया कि बच्चों के आत्महत्या करने की कुछ घटनाएं हुईं हैं।
ऐसे में अभिभावकों को ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे किसी के डांटने या अपशब्द कहने से अपमानित महसूस करते हुए यह कदम उठाते हैं। बच्चों को डांटें तो उसे अकेला नहीं छोडे़ं और कुछ देर बाद उसे दुलारें।
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. यूसी गर्ग व डॉ. दिनेश राठौर
- फोटो : अमर उजाला
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. यूसी गर्ग ने बताया कि यदि कोई कामकाज में रुचि न ले और गुमसुम रहे तो यह एक तरह आत्महत्या करने से पहले के लक्षण हैं। ऐसे में उसकी काउंसिलिंग करें, उसके साथ समय बिताएं, उसकी समस्या-परेशानी सुनें। जरूरी हो तो विशेषज्ञ से इलाज कराएं।
अवसाद है तो उपचार कराएं...
मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के डॉ. दिनेश राठौर ने बताया कि यदि किसी को अवसाद है तो उसका उपचार अवश्य कराया जाए। उपचार से अवसाद दूर हो सकता है। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि एक अध्ययन में पाया गया कि आत्महत्या करने वाले लोगों में 90 फीसदी अवसाद के मरीज थे। इनकी उम्र 19 से 39 साल थी।
बच्चों को डांटा है तो कुछ देर बाद उसे दुलारें भी
जिंदगी अनमोल है... इसे गंवाएं नहीं
1. कोई हताश होकर मरने की बात कहे तो उसे अकेला न छोडे़ं।
2. गुमसुम-अकेला रहे तो उससे बात करें और समय बिताएं।
3. आर्थिक नुकसान से कोई तनाव में हो तो उसे वैकल्पिक रास्ता बताएं। ऐसे उदाहरण दें जो लोग मुसीबत से उबरे हों।
4. कोई अवसाद में है तो मित्र, परिजन सकारात्मक बातें कर उनकी काउंसिलिंग करें।
( जैसा मनोचिकित्सक डॉ. यूसी गर्ग ने बताया)
240 दिन में 240 मामले
| 50 फीसदी |
घरेलू कलह |
| 35 फीसदी |
कर्ज और व्यापार घाटा |
| 05 फीसदी |
प्रेम प्रसंग |
| 10 फीसदी |
अन्य कारण |
(पुलिस का अध्ययन, एसएसपी ने दी जानकारी)