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World Hindi Day 2021: अमीर खुसरो ने हिंदी को खड़ी बोली के स्वरूप में बदला, दिलाई विश्व पटल पर पहचान

Sun, 10 Jan 2021 01:38 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कासगंज
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विश्व हिंदी दिवस: कवि बलवीर सिंह, अमीर खुसरो साहित्यकार डा. रामानंद तिवारी (बाएं से दाएं) - फोटो : अमर उजाला
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हिंदी में अलग-अलग तरह की बोलियों को जन्म देने वाली सपूतों की इस धरा पर स्थानीय अनदेखी से सम्मान नहीं मिल पा रहा। आज भी कासगंज में जन्मे साहित्यकारों, कवियों की बोलियां एवं लेख विश्व स्तर पर पहचान बनाए हुए हैं। तमाम लेखों पर तो शोध भी हुए हैं। विश्व हिंदी दिवस पर इन जन्मदाताओं की धरा को संरक्षण की विशेष जरूरत दिखाई दे रही है। 
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कवि अमीर खुसरो
पटियाली में जन्मे कवि अमीर खुसरो ने हिंदी को खड़ी बोली के स्वरूप में बदला। किताबें इस बात की गवाही दे रही हैं कि उन्होंने उर्दू और फारसी का आपस में मिलान किया और फिर खड़ी बोली बन गई। आज खड़ी बोली विश्वभर में सिर्फ इन्हीं की देन है। खड़ी बोली से पहले हिंदी का स्वरूप ब्रजभाषा और अवधि में चलता था। वैश्विक स्तर पर हिंदी का स्वरूप खड़ी बोली में बदला।

कवि बलवीर सिंह रंग
आधुनिक काल के कवि बलवीर सिंह रंग का जन्म अमांपुर क्षेत्र के गांव नगला कटीला में हुआ था। उन्होंने भी हिंदी को एक नई पहचान दिलाई थी। पहले गजल उर्दू और फारसी की विधा होती थी। उन्होंने गजल को हिंदी की गजल में लाने का काम किया। आज काव्य के इतिहास में उनकी हिंदी की गजलें बेहद लोकप्रिय बनी हुई हैं।
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साहित्यकार डा. रामानंद तिवारी
सोरों के रहने वाले साहित्यकार डॉ. रामानंद तिवारी भी आधुनिक काल के ही थे। इन्होंने हिंदी का महाकाव्य लिखा। नाम रखा पार्वती। जो हिंदी जगत में ऐतिहासिक महाकाव्य बना। किताबों में उल्लेख है कि वे दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञ थे। उनके दस से अधिक लेखों पर शोध भी हुआ। उन्हें भारतीय नंदन की उपाधि मिली थी।

साहित्यकार की बात
साहित्यकार डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित ने बताया कि कवि अमीर खुसरो, बलवीर सिंह रंगा, साहित्यकार डॉ. रामानंद तिवारी ही नहीं बल्कि साहित्यकार डॉ. नरेश बंसल, डॉ. रामकृष्ण शर्मा सहित तमाम साहित्यकारों का हिंदी के क्षेत्र में बेहद सराहनीय योगदान रहा। हिंदी के इन विशेषज्ञों के जन्मस्थल हों या उनकी यादें सहेजने के प्रयास उन पर बेहतर काम नहीं हो रहा। ऐसे में विश्व हिंदी दिवस पर उन्हें प्रशासनिक सम्मान मिलना चाहिए।
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