विश्व हिंदी दिवस: कवि बलवीर सिंह, अमीर खुसरो साहित्यकार डा. रामानंद तिवारी (बाएं से दाएं)
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हिंदी में अलग-अलग तरह की बोलियों को जन्म देने वाली सपूतों की इस धरा पर स्थानीय अनदेखी से सम्मान नहीं मिल पा रहा। आज भी कासगंज में जन्मे साहित्यकारों, कवियों की बोलियां एवं लेख विश्व स्तर पर पहचान बनाए हुए हैं। तमाम लेखों पर तो शोध भी हुए हैं। विश्व हिंदी दिवस पर इन जन्मदाताओं की धरा को संरक्षण की विशेष जरूरत दिखाई दे रही है।
कवि अमीर खुसरो
पटियाली में जन्मे कवि अमीर खुसरो ने हिंदी को खड़ी बोली के स्वरूप में बदला। किताबें इस बात की गवाही दे रही हैं कि उन्होंने उर्दू और फारसी का आपस में मिलान किया और फिर खड़ी बोली बन गई। आज खड़ी बोली विश्वभर में सिर्फ इन्हीं की देन है। खड़ी बोली से पहले हिंदी का स्वरूप ब्रजभाषा और अवधि में चलता था। वैश्विक स्तर पर हिंदी का स्वरूप खड़ी बोली में बदला।
कवि बलवीर सिंह रंग
आधुनिक काल के कवि बलवीर सिंह रंग का जन्म अमांपुर क्षेत्र के गांव नगला कटीला में हुआ था। उन्होंने भी हिंदी को एक नई पहचान दिलाई थी। पहले गजल उर्दू और फारसी की विधा होती थी। उन्होंने गजल को हिंदी की गजल में लाने का काम किया। आज काव्य के इतिहास में उनकी हिंदी की गजलें बेहद लोकप्रिय बनी हुई हैं।