नीदरलैंड दूतावास ने एएसआई और सिंधिया अनुसंधान केंद्र के साथ मिलकर डच प्रतिनिधिमंडल का आगरा दौरा किया। भगवान टॉकीज चौराहे के पास मराठा शासक महादजी सिंधिया और दौलतराव सिंधिया की फौज के कमांडर रहे जॉन हेसिंग का मकबरा देखने के लिए नीदरलैंड की राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के अधिकारी आए।
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भ्रमण के दौरान एएसआई की सहायक पुरातत्वविद आकांक्षा राय चौधरी ने लाल ताजमहल के नाम से मशहूर मकबरे के इतिहास और वास्तुकला की जानकारी दी। सिंधिया अनुसंधान केंद्र के प्रमुख अरुणांश बी गोस्वामी ने सिंधिया शासन और नीदरलैंड के बीच सैन्य और कूटनीतिक संबंधों के बारे में बताया कि 18वीं शताब्दी में मराठा शक्ति को डच सैनिकों ने मजबूत किया। डच सैन्य अफसरों ने मकबरे में सिर झुकाया और दीवारों को छूकर अपने पूर्वज की मौजूदगी का एहसास किया।
कौन थे लाल ताजमहल वाले जॉन हेसिंग
नीदरलैंड के यूट्रेक्ट में वर्ष 1739 में जन्मे जॉन हेसिंग सैनिक थे, जिन्होंने डच ईस्ट इंडिया कंपनी में सेवा की। हेसिंग वर्ष 1763 में भारत आए और यहां पैसे के लिए हैदराबाद के निजाम की सेना में काम किया। बाद में मराठा शासक महादजी सिंधिया की सेना में सेवा की। उनकी मृत्यु के बाद दौलतराव सिंधिया ने वर्ष 1799 में हेसिंग को आगरा किला का कमांडर बना दिया। वर्ष 1803 में मराठा-अंग्रेजों के बीच युद्ध में उनकी मृत्यु हो गई।
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डच-भारत संबंधों की अनूठी पहचान
हेसिंग की पत्नी एन हेसिंग ने एक लाख रुपये में तब हेसिंग का मकबरा बनवाया, जो लाल पत्थर से बना होने के कारण लाल ताजमहल के नाम से चर्चित हुआ। यह पहला स्मारक है, जिसे पत्नी ने सीमित संसाधनों में अपने पति की याद में बनवाया। यहां फारसी में शिलालेख हैं, जिन पर एन हेसिंग ने अपनी पति की मृत्यु पर महसूस किए गए दुख को दर्शाया है। यह डच और भारतीयों के बीच के संबंधों की अनूठी पहचान है।