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विजय दिवस: युद्ध विराम न होता तो लाहौर में फहरा देते तिरंगा

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रुदमुली का शहीद स्मारक और जवान
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आगरा। 16 दिसंबर...यह सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि भारतीय सेना के शौर्य एवं पराक्रम से पाकिस्तान पर मिली जीत के उत्सव का दिन है। महज 13 दिन चले युद्ध में सेना ने पाकिस्तान का इतिहास एवं भूगोल बदल दिया था। इसी युद्ध के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ था। 54 साल पहले 1971 में हुए युद्ध में बाह तहसील के 350 जवानों ने अपने शौर्य एवं पराक्रम से जीत की पटकथा लिखी थी। रुदमुली के जसकरन सिंह, फतेहपुरा के राजबहादुर सिंह, पुरा चौधरी के ऊधम सिंह बलिदान हुए थे। जीत के हीरो रहे रुदमुली के सर्वजीत सिंह, कोरथ के रामशंकर सिंह, बड़ागांव के महावीर सिंह, खिच्चरपुरा के राधेश्याम भदौरिया के चेहरे पर शौर्य एवं पराक्रम की झलक आज भी दिखती है। उन्होंने बताया कि युद्ध विराम न होता तो दुनिया के नक्शे से पाकिस्तान का नाम मिट जाता। लाहौर पर तिरंगा फहरा देते।
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युद्ध में रुदमुली के सपूतों ने पाकिस्तान की ढाका, अकोरा, हिल्ली , नागेश्वरी पोस्ट पर कब्जा कर तिरंगा फहरा दिया था। पूर्वी और पश्चिमी सेक्टर में पाकिस्तान की सेना को खदेड़ा था। पूर्वी सेक्टर में रुदमुली के सर्वजीत सिंह, विश्नु बहादुर, कर्नल रामाधार सिंह, कैप्टन निहाल सिंह, दिनेश प्रताप सिंह, नरेश सिंह, रघुराज सिंह, ओमकार सिंह, विजय सिंह, रतिभान सिंह, नरेश सिंह आदि ने मोर्चा संभाला था, जबकि पश्चिमी सेक्टर में अतर सिंह, श्रीराम, महेंद्र पाल सिंह, नरेंद्र सिंह, श्रीचंद्र, दुर्गविजय सिंह, भूपेंद्र सिंह, नजले, मूलचंद्र बरूआ, पातीराम, जगतपाल सिंह आदि ने पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे किए थे। रुदमुली का शहीद स्मारक वीर सपूतों के त्याग और बलिदान का गवाह है।


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गोलियों के जख्म भी नहीं डिगा सके जीत का हौसला
बड़ागांव, बाह के 87 वर्षीय महावीर सिंह भदौरिया 1963 में सेना में भर्ती हुए थे। 1965 में पाकिस्तान, 67 में चीन से युद्ध लड़ा था। 1971 में पाकिस्तान से फिर हुए युद्ध में चट्टान की तरह से अड़े रहे। वह बताते हैं कि युद्ध के दौरान दुश्मन की गोली उनकी दाहिनी बांह को पार करती हुई निकल गई लेकिन मोर्चा नहीं छोड़ा। करीब दस मिनट तक दुश्मनों को गोलियों से जवाब दिया। इसी बीच दूसरी गोली उनके बाएं पैर में लगी। फिर अपने आप को संभाला। पहाड़ी का सहारा लिया और दुश्मन के छक्के छूटने तक युद्ध के मोर्चे पर डटे रहे। जब पाक सेना के समर्पण की घोषणा हुई, तब साथियों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया। महावीर सिंह के शौर्य से प्रेरित होकर बेटा विक्रम सिंह भदौरिया और पौत्र दीपक सिंह भी वायुसेना में रह कर देश की सेवा कर रहे हैं।
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जीत तक दुश्मन के 10 बंकर ध्वस्त कर दिए थे
खिच्चरपुरा, बाह के 84 साल के राधेश्याम भदौरिया पाक जीत के हीरो रहे थे। वह 1969 सेना में नायक के पद पर भर्ती हुए। 1971 के युद्ध में पंजाब बार्डर पर वेरीबाला, असफवाला के मोर्चा पर तैनात थे। तब डेरावाला और मौजम पोस्ट पर पाकिस्तान का कब्जा था। राधेश्याम भदौरिया ने बताया कि 13 दिन तक चले युद्ध में दुश्मन के 10 बंकर ध्वस्त किए। बाह के रीछापुरा गांव के केशव सिंह गोली लगने से घायल हो गए। यूनिट के 5 जवान बलिदान हो गए। खून से वर्दी लाल हो गई। रॉकेट लाॅन्चर लेकर रावी नदी के किनारे पहुंचे। दुश्मनों के टैंकों को नष्ट किया। राधेश्याम भदौरिया के चार बेटे सतेंद्र सिंह, जो सेना से सूबेदार पद से तथा दूसरे नंबर के सुखवीर सिंह हवलदार के पद से रिटायर हो चुके हैं। तीसरे नंबर के सूबेदार इंद्रेश सिंह पुंछ रजौरी में व चौथे नंबर के कुलदीप डोडा में तैनात हैं।
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चीन की कैद नहीं डिगा पाई, पूर्वी सेक्टर में फहराया तिरंगा
- 1962 में चीन के मोर्चे पर अपने चचेरे भाई रघुवीर सिंह के साथ बहादुरी से लड़े बाह के रुदमुली गांव के सर्वजीत सिंह को ल्हासा चीन में कैद कर लिया गया था। वह जंग के मोर्चे पर चचेरे भाई हवलदार रघुवीर सिंह, बहनोई असरकी गढ़ी के वीरेंद्र सिंह, नवाटेडा के आदर्शपाल, फुफेरे भाई जगनपुरा भिंड के जसवंत सिंह के साथ लड़े थे। जिनमें से रघुवीर सिंह, वीरेंद्र सिंह, जसवंत सिंह शहीद हो गए थे। 10 माह बाद सर्वजीत सिंह चीन की कैद से आजाद हुए। कैद में मिली यातनाओं से सर्वजीत सिंह टूटे और झुके नहीं। 1965 में पाकिस्तान के खिलाफ जंग के मोर्चे पर पहुंच गए। 1971 में भी बहादुरी से लड़कर दुश्मन के दांत खट्टे कर जीत की पटकथा लिखी। पूर्वी सेक्टर में यूनिट के साथ उन्होंने पाकिस्तान को खदेड़ कर तिरंगा लहराया था। इतना ही नहीं अपने पुत्र रमेश सिंह को भी सेना में भर्ती कराया।

रुदमुली का शहीद स्मारक और जवान

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