कहते हैं कि ताजमहल के बनने में 20 साल का वक्त लगा था। उस दौर में यह सचमुच लंबा वक्त था, लेकिन वर्तमान में शहर में चल रही सरकारी योजनाओं का हाल देखें तो यह वक्त कम लगता है।
पहले स्मार्ट सिटी की बात करते हैं। यह प्रोजेक्ट अभी कागजों से बाहर नहीं निकला है जबकि इसकी कहानी 20 साल पहले शुरू हुई थी। मई
1999 में भी आगरा सहित कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, लखनऊ, नोएडा, बरेली को स्मार्ट सिटी बनाने का प्रस्ताव था। तब भी शहरवासी इसी तरह खुश होते थे कि अपना शहर स्मार्ट होने जा रहा है।
स्मार्ट सिटी
हालात अभी वही हैं, खुशी तो बहुत है, पर काम कहीं नजर नहीं आ रहा। अब गंगाजल की बात। गंगा का पानी शहर को मिलेगा, पेयजल संकट खत्म होगा।
यही उम्मीद तो है लेकिन यह कहानी भी 20 साल से चली आ रही है। तब मुद्दा यह होता था कि अगर गोकुल बैराज को गंगाजल डाउनस्ट्रीम में मिल जाए तो आगरा के लोगों को कुछ अच्छा पानी मिले।
तत्कालीन मेयर बेबी रानी मौर्य ने गोकुल बैराज में हरनाल स्कैप से लाकर मिलाए जाने वाले करीब 150 क्यूसेक गंगाजल को डाउन स्ट्रीम में मिलाने की मांग की थी।
2008 में बनना था स्मार्ट सिटी
दरअसल, हरनाल स्कैप से आने वाला गंगाजल गोकुल बैराज के अप स्ट्रीम में मिलाया जाता है, ताकि यमुना का पानी शुद्ध हो सके लेकिन इसका लाभ आगरा को नहीं मिल पाता है।
1999 में भी 150 क्यूसेक के स्थान पर महज 60 क्यूसेक गंगाजल मिलाया जा रहा था। इसके बाद 2007 में मेयर अंजुला सिंह माहौर के कार्यकाल में गंगाजल प्रोजेक्ट की डीपीआर बनी।
इस योजना के तहत 2008 तक सभी शहरों की पुलिसिंग को स्मार्ट करने, सरकारी कार्यालयों को स्मार्ट करने की योजना थी ताकि लोगों को अपने काम के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़े हैं।
लेकिन 2018 तक यह योजना परवान नहीं चढ़ पाई है। पुलिस उसी ढर्रे पर काम रही है और सरकारी कार्यालयों में ई-गवर्नेंस पूरी तरह से लागू नहीं हो पाई है।