आगरा। एसोसिएशन ऑफ मिनिमल एक्सेस सर्जन्स ऑफ इंडिया (अमासी) की ओर से 118वीं अमासी स्किल कोर्स एंड एफमास एग्जाम के दूसरे दिन लैप्रोस्कोपी सर्जरी और प्रसूति एवं स्त्री रोग पर विशेषज्ञों ने अपने व्याख्यान दिए। कहा गया कि लैप्रोस्कोपी से डायफ्रामिक हार्निया से रेक्टल कैंसर तक का इलाज आसान हो गया है।
आयोजक डॉ. हिमांशु यादव ने बताया कि दूसरे दिन 120 चिकित्सकों ने गायनिक की परीक्षा दी। शनिवार को 80 चिकित्सक सर्जरी की परीक्षा देंगे। कॉन्फ्रेंस में केरल, श्रीनगर, पटना, कलकत्ता, हैदराबाद, सूरत, भोपाल, लखनऊ, तमिलनाडु, पटियाला आदि स्थानों से आए चिकित्सक प्रतिभाग कर रहे हैं।
आयोजन में दिल्ली एम्स से आए डॉ. सौरभ गालोढा ने बताया कि डायफ्रामिक हर्निया में डायफ्राम में परेशानी के कारण पेट के अंग छाती की ओर हो जाते हैं। लैप्रोस्कोपी से इसके इलाज में कम दर्द होता है और काफी तेजी से रिकवरी हो जाती है।
मुंबई से आए डॉ. समीर रेगे ने बताया कि लैप्रोस्कोपिक रेस्टोपेक्सी रेक्टल प्रोलैप्स के आधुनिक और सर्वश्रेष्ठ उपचारों में से एक है। यह कम दर्द और कम समय में बेहतर परिणाम के साथ सफलता देती है। डॉ. मधुसूदन अग्रवाल ने बताया कि लैप्रोस्कोपिक अड्रेनलेक्टोमी अधिवृक्क ग्रंथि के ट्यूमर जैसे फिओक्रोमोसिटोमा, एल्डोस्टेरोनोमा और कोर्टिसोल-सेक्रेटिंग एडेनोमा के इलाज में छोटे चीरा वाली तकनीक है।
छोटे पोर्ट्स से कैमरा व उपकरण डालकर एड्रेनल ग्लैंड को सावधानीपूर्वक डिसेक्ट किया जा सकता है। डॉ. सुरेंद्र पाठक ने बताया कि लैप्रोस्कोपिक ग्रोइन हर्निया रिपेयर में सही एनोटॉमी पहचान सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। डायरेक्ट, इनडायरेक्ट और फेमोरल हर्निया की पहचान इन्फीरियर एपीगैस्ट्रिक वेसल्स के संबंध से की जाती है।
श्रीनगर से आए डॉ. निसार हमदानी ने बताया कि रेक्टल कैंसर में लैप्रोस्कोपिक सर्जरी सुरक्षित और अच्छा विकल्प है। आयोजन के संयोजक गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल सर्जन डॉ. हिमांशु यादव ने बताया कि कई बार देखा गया है की पित्त की थैली में पथरी होने पर स्टोन थैली की नेक में फंस जाता है। उसमें पस पड़ जाता है। गर्भवती महिला के मामले में ऑपरेशन के दाैरान मरीज के साथ-साथ उसके बच्चे को बचाना भी महत्वपूर्ण होता है। ऐसी स्थिति को मुश्किल गाल ब्लैडर सर्जरी कहा जाता है। कॉन्फ्रेंस में डॉ. अंकुर बंसल, डॉ. अनुभव गोयल, डॉ करन रावत, डॉ. अभिनव मित्तल, विनायक मिश्रा, मयंक जैन आदि मौजूद रहे।