आगरा। पॉलिसी एक, 20 साल तक नियमित प्रीमियम भी साथ ही भरा। इसके बाद भी पति को बीमा का पूरा लाभ दिया गया लेकिन पत्नी को नहीं। इस पर सवाल उठाते हुए पत्नी ने जिला उपभोक्ता प्रतितोष आयोग प्रथम की शरण ली। आयोग ने इसे सेवा में कमी, पहले व्यापार फिर अनुचित व्यापार की श्रेणी मानते हुए भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) से 1.86 लाख रुपये का चेक पीड़िता को उपलब्ध कराया।
आयोग के अध्यक्ष सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह ने इस मामले की सुनवाई की। कमला नगर निवासी अंजलि जैन ने बताया कि 26 सितंबर, 2003 को एलआईसी से 20 साल की अवधि वाली बीमा पॉलिसी ली थी। पांच लाख रुपये की बीमित राशि वाली इस पॉलिसी के लिए वह हर साल 31,986 रुपये प्रीमियम जमा करती थीं। वर्ष 2023 में पॉलिसी परिपक्व हुई तो उन्हें 12 लाख रुपये मिले। उनके पति ने भी यही पॉलिसी ली थी। उनकी पॉलिसी पर 13,45,620 रुपये का भुगतान किया गया। उन्होंने एलआईसी से अंतर की रकम मांगी लेकिन कंपनी ने लाभ का विकल्प नहीं चुने जाने की दलील देकर भुगतान करने से मना कर दिया।
पॉलिसी की शर्तों के पीछे नहीं छिप सकती कंपनी
आयोग ने पाया कि पॉलिसी में लाभ का विकल्प नहीं चुने जाने की स्थिति में भी शर्तों के अनुसार बीमित राशि का दो प्रतिशत लाभ प्रत्येक दो वर्ष पर देने की व्यवस्था थी। इसके बावजूद एलआईसी ने इस लाभ का भुगतान नहीं किया और धनराशि पॉलिसी की पूरी अवधि तक अपने पास रखी। आयोग ने कहा कि कंपनी अपनी पॉलिसी की शर्त की आड़ में देय लाभ से किसी को वंचित नहीं कर सकती। पॉलिसी देते वक्त व्यवहार का आधार लिया जाता है, बाद में इसे अनुचित व्यापार का रूप दे देना ठीक नहीं है। यह कार्य सेवा की कमी के दायरे में भी आता है।
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