ताजमहल ने अपनी दीवारों पर यमुना नदी में आई हर बाढ़ को सहेज कर रखा है। ताजमहल की उत्तरी दीवार को छूती हुई यमुना नदी में जब-जब बाढ़ आई, तब-तब हर बाढ़ के निशान को ताजमहल की दीवार पर उकेरा गया है। ब्रिटिश काल से इसकी शुरुआत हुई। वर्ष 1924 से लेकर अब तक की हर बाढ़ के निशान दर्ज हैं। वर्ष 1978 में आई भयंकर बाढ़ के निशान भी ताजमहल के बसई घाट की ओर की उत्तरी दीवार पर मौजूद हैं।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने ताजमहल की दीवारों पर बाढ़ के निशान उकेरे हैं। वर्ष 1924 में सबसे पहले बाढ़ आई। उसके बाद वर्ष 1978 की बाढ़ ऐतिहासिक रही, जब पानी ताजमहल के तहखानों के 22 कमरों में पहुंच गया था। ताजमहल में लकड़ी के दरवाजे बसई और दशहरा घाट की ओर थे। लकड़ी के दरवाजे हटाकर इन्हें ईंटों से बंद कर दिया गया है।
चमेली फर्श से बाढ़ देखने आया लोगों का हुजूम
ताजगंज निवासी ताहिरुद्दीन ताहिर बताते हैं कि वर्ष 1978 की बाढ़ में चमेली फर्श पर शहर के लोगों का हुजूम उमड़ने लगा था। यहां से चंद हाथ नीचे ही यमुना बह रही थी, जिसे देखने लोग पहुंचते थे। तत्कालीन एएसआई अधिकारियों ने हादसे की आशंका पर ताजमहल को कई दिनों के लिए बंद कर दिया था। एत्माद्दौला में यमुना किनारे बनी संगमरमर की मछली भी पानी में डूब गई थी।
दरारों में भरवाई थी रस्सी
वर्ष 1978 में जब बाढ़ आई तो ताज के तहखाने के कमरों में पानी पहुंचने लगा, तब हमने जालियों और दरारों में सीमेंट में भीगी सन की रस्सी भरवाई थी। इसी तरह एत्माद्दौला में भी किया गया। तब बाढ़ के कारण ताजमहल में पर्यटकों का प्रवेश भी बंद कर दिया गया था। - डाॅ. आरके दीक्षित, पूर्व एएसआई अधिकारी
पत्थरों की रैंप बनवाई
ताजमहल समेत यमुना किनारे के सभी स्मारकों पर बाढ़ के निशान लगाए गए हैं ताकि आने वाले समय में उनसे बचाव के तरीकों को अपनाया जा सके। ताजमहल के बसई घाट पर पत्थरों की रैंप बनाई गई थी, ताकि पानी सीधे ताज से न टकराए और दीवार से दूर बहकर निकले। - एसके कुलश्रेष्ठ, पूर्व एएसआई अधिकारी
स्मारकों का निरीक्षण
अधीक्षण पुरातत्वविद डाॅ. राजकुमार पटेल ने बताया कि यमुना नदी के बढ़ते हुए जलस्तर को देखते हुए एत्माद्दौला, रामबाग, ताजमहल समेत स्मारकों का निरीक्षण किया है। बाढ़ का पानी भूमिगत कमरों में न आए, इसके लिए व्यवस्थाएं करने को कहा गया है। कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है।