महानगर अध्यक्ष पद के लिए नागेंद्र प्रसाद दुबे गामा, विजय शिवहरे और अनिल चौधरी में शिवहरे सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे थे। प्रतिद्वंद्वी भी उन्हीं से सीधी टक्कर बता रहे थे। उनके मैदान छोड़ने से चुनाव का रंग बदल गया। विजय दोपहर 1.20 बजे नामांकन पत्र लेने पहुंचे। उन्हें पता था कि नामांकन एक बजे तक ही हो सकेगा फिर भी पहले से पर्चा भी नहीं लिया था। चुनाव से हटने के उनके इस नाटकीय अंदाज के कारण अंतिम क्षण तक सस्पेंस बना रहा।
आई सफाई से इतर, सूत्रों की मानें तो विजय शिवहरे के हटने की पटकथा नामांकन से ठीक पहले विधायक योगेंद्र उपाध्याय के निवास पर हुई बैठक में लिखी गई। पांच दावेदारों में से तीन एक गुट के हैं और दो दूसरे के। पार्टी सूत्र बताते हैं कि दूसरे गुट से विजय शिवहरे और अनिल चौधरी के नामों पर मंथन चल रहा था। इनमें से एक नाम ऐन वक्त पर वापस लेने की भी योजना थी। चूंकि अनिल चौधरी के पास केंद्रीय राज्यमंत्री के प्रतिनिधि का पद है, ऐसे में विजय शिवहरे को आगे करने का विचार था। मगर, पार्टी कार्यकर्ताओं की मानें तो विजय शिवहरे के पास न तो प्रस्तावक के रूप में मंडल अध्यक्ष थे और न ही समर्थक के रूप में जिला प्रतिनिधि। अनिल चौधरी के साथ ऐसा नहीं था। ऐसे में शिवहरे को पीछे हटने के लिए तैयार किया गया। वहीं, गणेश चंद के पास दो प्रस्तावक और समर्थक ऐसे थे जो सिर्फ उन्हीं का समर्थन करते। इस स्थिति में विरोधी खेमे के कई नामों को देखते हुए दूसरे खेमे से गणेश चंद का नाम को आगे बढ़ाना पड़ा। सिर्फ प्रतिद्वंद्वियों को चकमा देने के लिए ऐन वक्त तक विजय शिवहरे का नाम उछाला जाता रहा। यहां तक कि अनिल चौधरी के नामांकन से पहले शिवहरे के समर्थन में नारे लगाए गए।
मैं जाम में फंस गया था, इसलिए नामांकन के लिए समय पर नहीं पहुंच सका। मैं पार्टी अनुशासित सिपाही हूं और रहूंगा।
- विजय शिवहरे
दांव पर कठेरिया की प्रतिष्ठा
महानगर अध्यक्ष पद के लिए दावेदारी भले ही अनिल चौधरी ने की हो लेकिन परीक्षा केंद्रीय राज्यमंत्री डा. रामशंकर कठेरिया की भी है। दरअसल, अनिल चौधरी केंद्रीय राज्यमंत्री से वर्ष 2007 से जुड़े हुए हैं। कठेरिया जब जिलाध्यक्ष थे तब वे उनकी टीम में महामंत्री थे। 2009 में जब कठेरिया सांसद हुए तब चौधरी उनके प्रतिनिधि थे और जब कठेरिया मंत्री बने तब भी वे उनके प्रतिनिधि हैं। ऐसे में उनकी हार-जीत से कठेरिया की प्रतिष्ठा को भी जोड़ा जा रहा है।
अब दंगल गामा-चौधरी के बीच
पांच दावेदारों के बीच असल मुकाबला नागेंद्र प्रसाद दुबे गामा और अनिल चौधरी के बीच माना जा रहा है। दोनों की संगठन और संघ में खासी पकड़ है। हालांकि दोनों के समर्थक अभी से उन्हें ही विजेता मान रहे हैं। गणेश चंद के नाम पर भी कोर कमेटी गंभीरता से विचार कर सकती है। सहमति न होने से अनुमान है कि दो दिन में नहीं महानगर अध्यक्ष का नाम जनवरी के पहले सप्ताह में घोषित होगा।
मजे प्रस्तावकों और समर्थकों के
इस चुनाव में मंडल अध्यक्ष और जिला प्रतिनिधियों को प्रस्तावक व समर्थक के रूप में दावेदारों को सहमति देनी थी। दो प्रमुख दावेदारों ने अधिकांश प्रस्तावकों-समर्थकों को ‘हाईजैक’ कर लिया था। शनिवार की रात एक ने उन्हें हरीपर्वत स्थित होटल में ठहराया तो दूसरे ने ताजगंज के होटल में। खातिरदारी में भी कोई कमी नहीं। हां, उनके मोबाइल जरूर बंद करा लिए थे ताकि कोई और डोरे न डाल सके। रविवार को इन्हें होटल से ही सीधे भाजपा कार्यालय लाया गया। वह भी दूसरे वाहनों में, कड़ी निगरानी के बीच।
पहले ही कमजोर कर
दी थीं विजय की नींव
विरोधियों ने विजय शिवहरे की दावेदारी की नींव पहले की कमजोर कर दी थी। दरअसल, उनका क्षेत्र सुभाष मंडल में आता है। विरोधियों ने उनके मंडल में पहले ही चुनाव नहीं होने दिया था। यहां कम सदस्यता का हवाला देते हुए विरोधियों ने इस मंडल पर चुनाव निरस्त करा दिया था। उन्हें आशंका थी कि यदि इस मंडल का अध्यक्ष और जिला प्रतिनिधि चुना जाता तो उन्हें विजय शिवहरे का समर्थन होता और महानगर अध्यक्ष चुनाव में ये दोनों उनका समर्थन करते।
धांधली की शिकायत
वरिष्ठ भाजपा कार्यकर्ता सुभाष ढल ने निर्वाचन अधिकारी से मंडल चुनावों में धांधली की शिकायत की है। उनका कहना है कि पार्टी के कुछ पदाधिकारियों ने तीन मंडलों पर सदस्यता कम होने की वजह से चुनाव नहीं कराए थे। उन्होंने पत्र में कहा है कि एक बैठक में ब्रजक्षेत्र अध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष की उपस्थिति में बूथवार 75 हजार से अधिक सदस्य बनाए जाने का दावा किया था। मंडल चुनाव के दौरान सिर्फ 35 हजार सदस्य बताए गए। उन्होंने सदस्यों की सूची में धांधली के आरोप लगाए हैं। यह शिकायत उन्होंने राष्ट्रीय महामंत्री संगठन से भी की है।