बाह। सुंदर, चंचल छोटी सी चिड़िया, नाम है खंजन (व्हाइट वेगटेल)। यूरोप और एशिया के देशों में पाई जाने वाली व्हाइट वेगटेल की चंबल सेंक्चुअरी की बाह रेंज में मौजूदगी पर्यटकाें का मन मोह रही है। जब ये चिड़िया नदी किनारे अपनी पूंछ हिलाकर फुदकती है या फिर पंख फैला कर उड़ान भरती है तो रोमांचित कर देती है।
खंजन का वैज्ञानिक नाम मोटासिला अल्बा है। इनकी लंबाई 16-20 सेमी, वजन 20-25 ग्राम होता है। इनके पंख काले और सफेद होते हैं। गला काले रंग का, माथे और सिर से लेकर गर्दन के किनारे तक सफेद रंग होता है। बाह के रेंजर कुलदीप सहाय पंकज ने बताया कि व्हाइट वेगटेल पर्यटकों के लिए किसी आकर्षण से कम नहीं है। अच्छी बात ये है कि चंबल में प्रवास के लिए आने वाली व्हाइट वेगटेल प्रजनन करने लगी है। पिछले साल व्हाइट वेगटेल की नेस्टिंग रिकॉर्ड हुई थी। नेस्ट में 2-3 अंडे दिए थे। जिनसे जन्में करीब 50 चूजों ने उड़ान भरी थी। चिड़ियों की नेस्टिंग की देख रेख सफल हो रही है। कुनबा बढ़ने से विभाग उत्साहित है। उन्होंने बताया कि व्हाइट वेगटेल के नर मादा एक जैसे होते हैं। कीड़े, मकोड़े इनका भोजन होते हैं।
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रामचरित मानस में भी खंजन का जिक्र
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में खंजन चिड़िया का कई बार जिक्र किया है। राम वन गमन की चौपाई ‘खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहिं सिय सैननि।’ इसमें सीता जी की आंखों की तुलना खंजन पक्षी से की गई है। शरद ऋतु का वर्णन करते हुए खंजन को लेकर ‘जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।’ लिखा है। वहीं मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत में ‘निरख सखी, ये खंजन आए। फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाए’ उर्मिला द्वारा खंजन पक्षी को देख कर लक्ष्मण की सुंदरता से तुलना करने का जिक्र किया है।
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ऐसे पहुंचें चंबल- जिला मुख्यालय आगरा से 85 किमी की दूरी पर, इटावा से 40 किमी की दूरी पर, शिकोहाबाद से 45 किमी की दूरी पर नंदगवा का इंटर प्रिटेशन सेंटर है। आगरा, इटावा, शिकोहाबाद तक ट्रेन से पहुंचने के बाद बस या टैक्सी से सैलानी ईको टूरिज्म सेंटर नंदगवा तक पहुंच सकते हैं। चंबल भ्रमण के लिए विदेशी सैलानी को 600 रुपये तथा स्थानीय सैलानी को 50 रुपये का शुल्क अदा करना पड़ेगा।