आगरा में एक चौराहे पर लगी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा
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‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आगरा में भी जंग ए आजादी के दीवानों को आगे बढ़ने की राह दिखाई थी। वह वर्ष 1940 में यहां आए थे। चुंगी मैदान पर हुई उनकी सभा में भारी भीड़ उमड़ी थी। नेताजी ने कहा था कि अब अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़ने का समय आ गया है।
कई किताबों में नेताजी के भाषण का जिक्र
इतिहासकार राज किशोर शर्मा राजे बताते हैं कि आगरा में स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास पर लिखी गईं कई किताबों में नेताजी के भाषण का जिक्र मिलता है। नेताजी ने कांग्रेस से अलग होकर ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक पार्टी बनाई थी। इसी पार्टी की वर्ष 1940 में आगरा में सभा रखी गई थी। यह मोतीगंज के चुंगी मैदान पर हुई थी। नेताजी ने कहा था कि गांधीजी जिस रास्ते का अनुसरण कर रहे हैं, उससे आजादी मिलने में बहुत समय लगेगा। उन्होंने जर्मनी का उदाहरण दिया कि वह सशस्त्र लड़ाई लड़ रहा है। फिर कहा कि अब हमारे लिए भी सशस्त्र लड़ाई का समय आ चुका है।
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खातीपाड़ा में रुके थे
नेताजी कई दिन तक लोहामंडी के खातीपाड़ा में रतन लाल जैन के निवास पर रुके थे। आगरा के क्रांतिकारी उनसे मिलने के लिए जाया करते थे। इनमें रोशन लाल गुप्त करुणेश, वासुदेव गुप्ता, कलुआ राम, सेठ अचल सिंह, कृष्ण दत्त पालीवाल शामिल थे।
नेताजी के नाम पर है सुभाष बाजार का नाम
वर्ष 1937 में भी नेताजी आगरा आए थे। इसके बाद एक बाजार का नाम ही सुभाष बाजार कर दिया गया। यह जामा मस्जिद के पास का बाजार है। कारोबारी गिर्राज कुमार अग्रवाल ने बताया कि इससे पहले बाजार का नाम मस्जिद तला था।
बाह के चार सपूतों ने की थी ब्रिटिश हुकूमत से बगावत
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का क्रांतिकारी भाषण सुन ब्रिटिश हुकूमत से बगावत करने वालों में आगरा बाह के भी चार रणबांकुरे शामिल थे। कल्यानपुर गांव के अगर सिंह, रीछापुरा गांव के विश्वनाथ सिंह, उमरैठा के बाबू सिंह, कोरथ गांव के शिवधार सिंह ब्रिटिश सेना में थे।
रंगून, सिंगापुर, जापान तक की लड़ाई में जौहर दिखाए। वर्ष 1939 में जापान में कैद कर लिए गए। सूचना पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मनी से वाया टोकियो जापान पहुंचे। यहां उनके भाषण को सुनकर सैनिकों ने ब्रिटिश हुकूमत से बगावत कर दी। अगर सिंह, विश्वनाथ सिंह, बाबू सिंह, शिवधार सिंह अन्य सैनिकों के साथ आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए।
नेताजी के अंगरक्षक रहे विश्वनाथ
रीछापुरा गांव के विश्वनाथ सिंह नेताजी के अंगरक्षक रहे थे। उनके बेटे हरेंद्र सिंह, उपेंद्र सिंह, भूपेंद्र सिंह बाद में भारतीय सेना का हिस्सा बने। उन्होंने बताया कि पिताजी नेताजी के बहुत करीबी थे। उनके बारे में बताया करते थे।
शिवधार को युद्ध कौशल सम्मान
शिवधार सिंह ने वर्ष 1939 से 1945 तक बहादुरी से लड़ने पर सरकार ने असाधारण युद्ध कौशल सम्मान प्रदान किया। परिवार में अन्य लोग भी सेना में रहे। उनके भाई मेवाराम वर्ष 1962 के चीन युद्ध में शहीद हुए। पिता शिवदयाल वर्ष 1939 के युद्ध में शामिल हुए। दादा नौरंग सिंह ने सौमालिया, इराक की जंग में जौहर दिखाए थे।