पिछले 100 साल में यमुना नदी में आई बाढ़ किन क्षेत्रों तक पहुंची और यमुना नदी का डूब क्षेत्र क्या है, इसका निर्धारण कर दिया गया है। सरकार ने इसकी अधिसूचना जारी करके नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को हलफनामा सौंपा है। इसमें 17 जिलों से गुजर रही यमुना नदी के 1056 किमी लंबे पाट के दोनों ओर के डूब क्षेत्र को शामिल किया गया है।
केंद्रीय जल आयोग ने रिसर्च इंस्टीट्यूट और विशेषज्ञों की मदद से किये अध्ययन में असगरपुर से इटावा तक और शाहपुर से प्रयागराज तक यमुना नदी के डूब क्षेत्र को निर्धारित किया है। आगरा के पर्यावरणविद डॉ. शरद गुप्ता की याचिका पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने यमुना नदी के डूब क्षेत्र को तय करने के लिए पिछले साल 11 सितंबर को आदेश जारी किया था।
दिसंबर में केंद्रीय जल आयोग ने अध्ययन करके रिपोर्ट तैयार की। सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव ने रिपोर्ट के साथ एनजीटी में हलफनामा दाखिल किया। जिसमें डूब क्षेत्र के निर्धारण की जानकारी दी गई है। 100 साल में कई बार आई बाढ़ के आधार पर यमुना नदी के डूब क्षेत्र को तय किया गया है। नोएडा से लेकर प्रयागराज तक सरकारी विभाग एक दूसरे पर इसकी जिम्मेदारी डाल रहे थे और यमुना के किनारे अवैध निर्माण की शृंखला बन गई थी।
इन विशेषज्ञों ने किया अध्ययन
एनजीटी के आदेश पर असगरपुर से इटावा तक और शाहपुर से प्रयागराज के बीच दो हिस्सों में यमुना नदी के डूब क्षेत्र का निर्धारण किया गया। इसमें नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच), गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग (जीएफसीसी), राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी), उत्तर प्रदेश सरकार, डीओडब्ल्यूआर, आरडी एंड जीआर और केंद्रीय जल आयोग के अधिकारियों के प्रतिनिधियों के साथ 100 साल में आई बाढ़ का अध्ययन किया।
17 जिलों में 1056 किमी के स्ट्रेच में 5, 25 और 100 साल में आई बाढ़ ने कितना नुकसान किया, यह भी देखा। सेटेलाइट इमेज की मदद से हर जिले का बाढ़ में डूबा हुआ क्षेत्र तैयार किया गया। इसमें बाढ़ के पैटर्न को भी बताया गया है। पर्यावरणविद डॉ. शरद गुप्ता की ओर से एनजीटी में सॉलिसिटर अंशुल गुप्ता ने डूब क्षेत्र के लिए पैरवी की।
इन 17 जिलों में बाढ़ क्षेत्र की अधिसूचना
गौतम बुद्ध नगर, अलीगढ़, हाथरस, मथुरा, आगरा, फिरोजाबाद, इटावा, जालौन, औरैया, कानपुर देहात, फतेहपुर, कानपुर, हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट, कौशांबी, प्रयागराज में हर जिले के सेटेलाइट कॉर्डिनेट्स दिए गए हैं। इससे वैज्ञानिक तरीके से डूब क्षेत्र पहचाना जाएगा। इससे कोई छेड़छाड़ नहीं हो सकेगी।