सांसद रामजीलाल सुमन ने राज्यसभा में आशा कार्यकर्ताओं की बदहाली का मुद्दा उठाते हुए उनके मानदेय को न्यूनतम मजदूरी के बराबर करने की मांग की। उन्होंने कहा कि महामारी में अहम भूमिका निभाने के बावजूद आज भी आशा कार्यकर्ताओं को बेहद कम मानदेय मिल रहा है, जिससे उनका जीवन कठिन हो गया है।
राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद रामजीलाल सुमन ने विशेष उल्लेख के जरिए बृहस्पतिवार को आशा कार्यकर्ताओं की बदहाली का मुद्दा उठाया। उन्होंने सरकार से उनकी सेवाएं नियमित करने और न्यूनतम मजदूरी के बराबर मानदेय देने की मांग की है।
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सांसद सुमन ने सदन में कहा कि वर्ष 2005 में शुरू हुए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की मुख्य कड़ी आशा कार्यकर्ता ही हैं, लेकिन 20 साल बाद उनकी स्थिति दयनीय है। 2,000 प्रति माह के मानदेय में घर चलाना संभव नहीं है। टीकाकरण के लिए 150 और प्रसव सहायता के लिए मिलने वाले 600 उनके कठिन श्रम का उपहास हैं। यह मानदेय ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।
सुमन ने याद दिलाया कि महामारी के दौरान अपनी जान जोखिम में डालकर इन कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर सेवाएं दी थीं। उन्होंने जोर दिया कि आशा को कुशल श्रमिकों के समान वेतन मिले। महंगाई के दौर में उनके श्रम का सही मूल्यांकन हो। सेवाओं को नियमित कर उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान की जाए। यदि सरकार इनका सम्मान और आर्थिक स्थिति सुरक्षित करती है, तो ये और अधिक निष्ठा से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत कर सकेंगी।