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आत्महत्या नहीं, समाधि है संथारा : आचार्य श्री

Tue, 25 Aug 2015 01:23 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला, आगरा
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संथारा पर राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के बाद देश भर के जैन समाज ने विरोध के स्वर उठाए हैं। ताजनगरी में जैन आचार्य विनम्र सागर महाराज ने संथारा को आत्म शोधन और समाधि की प्रक्रिया करार दिया। उन्होंने कहा कि जैन धर्म में चींटी को भी मारना मना है, अगर संथारा आत्महत्या होती तो इसे अनुमति कैसे दी जाती। कोर्ट को फैसला देते हुए प्राचीन परंपराओं, धर्म के बारे में जानना चाहिए था।
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आचार्य विनम्र सागर ने कहा कि एक जज लिख चुके हैं कि संथारा आत्महत्या नहीं है। यह आत्म शोधन है। मोक्ष की प्राप्ति का रास्ता है। संथारा इच्छा मृत्यु है ही नहीं, बल्कि यह एक व्रत है, जिसे साधक अपनी इच्छा के अनुरूप धर्मशास्त्र की प्रक्रिया के अनुरूप करता है। आत्म साधना की धार्मिक क्रिया को प्रतिबंधित करना स्वीकार नहीं है।

मृत्यु का महोत्सव है संथारा
आचार्य के मुताबिक जीने की खुशी तो हर कोई मनाता है, लेकिन मृत्यु पर महोत्सव मनाना मुश्किल है। जो मरते समय महोत्सव मनाता है, उसका मरण मिट जाता है। संथारा अपने परिग्रह को कम करके आसक्तियों को धीरे-धीरे त्यागने की प्रक्रिया है। ऐसा मरण, जिसमें आंखों में आंसू न हों। अगर इसे आत्महत्या माना जा रहा है तो रामायण काल में माता जानकी और महाभारत काल में भीष्म की मृत्यु क्या है। कोर्ट के सामने सही तथ्य रखने की जरूरत है।
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दिखा दो ताकत, बदलेगा फैसला
आचार्य विनम्र सागर ने सभा में कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ रिट तो दायर की गई है, लेकिन ऐसा निर्णय दोबारा न हो, इसलिए अपनी शक्ति दिखानी होगी। पूरा जैन समाज एकजुट है। अगर आज हम अपनी आवाज नहीं उठाएंगे और शक्ति नहीं दिखाएंगे तो सरकार कल कहेगी कि नग्नता से चलना विकृति है। कहेंगे कि नग्न नहीं चल सक ते। जब तक निर्णय नहीं बदलता, तब तक अपनी बात रखनी होगी। उन्हें विश्वास है कि यह निर्णय बदलेगा। समाज की शक्ति बेकार नहीं जाएगी।
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