स्वयंसेवकों का बौद्धिक और शारीरिक विकास मुख्य शिक्षक की जिम्मेदारी
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बुधवार को सरस्वती शिशु मंदिर कमला नगर में आयोजित संघ प्रमुख मोहन भागवत की पाठशाला में मुख्य शिक्षक, कार्यवाह और प्रवासी दायित्ववानों को टिप्स दिए गए। सरसंघचालक ने कहा कि शाखा पर आने वाले स्वयंसेवकों का व्यक्तित्व निर्माण उनकी पहली जिम्मेदारी है। गणशिक्षकों और गणनायकों को स्वयंसेवक में नेतृत्व क्षमता, विचारों का प्रस्तुतीकरण और अपनत्व की भावना जागृत करनी होगी। तभी सशक्त और सामर्थ्यवान समाज की रचना हो सकती है।
सुबह करीब 6.30 बजे से इस कार्यक्रम में संघ की सबसे अहम कड़ी माने जाने वाले करीब 350 मुख्य शिक्षक, कार्यवाह और प्रवासी दायित्ववान पूर्ण गणवेश में उपस्थित रहे। संघ प्रमुख ने भी बेहद हल्के माहौल में उनसे सीधा संवाद किया। उदाहरण देकर जिज्ञासाएं शांत कीं। अपने पांच दिन के प्रवास के दौरान हुए बेहतरीन कार्यक्रमों के लिए उन्होेंने स्वयंसेवकों की सराहना की। साथ ही कहा कि कि यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कार्यक्रम कितना सफल था, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हमने इस कार्यक्रम से क्या सीखा।
संघ, समाज और राष्ट्र के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिली या नहीं। उन्होंने कहा कि शाखाओं का विस्तार किया जाए और स्वयंसेवकों को इतना सशक्त किया जाए कि वे हर परिस्थिति का सामना करना कर सकें। अनुशासन, अनुकरण और अनुसरण जैसे गुणों का विकास किया जाए। स्वयंसेवकों का शारीरिक और बौद्धिक विकास करना ही मुख्य शिक्षकों की पहली जिम्मेदारी है। प्रभावी शाखाएं ही राष्ट्र की समस्याओं का समाधान कर सकती हैं।