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Taj Mahotsav 2026: ताज महोत्सव में इस बार आईं लाल चंदन की बेशकीमती मूर्तियां, जानें क्या है इनकी कीमत

Fri, 20 Feb 2026 10:00 AM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा

सार

ताज महोत्सव में लाल चंदन की बेशकीमती मूर्तियां आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं। इन पर नक्काशी ऐसी है कि एक नजर नहीं हटती है। आइये बताते हैं कि क्या है इनकी कीमत...
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लाल चंदन की बेशकीमती मूर्तियां - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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ताज महोत्सव इस बार लाल चंदन की खुशबू से महक रहा है। बृहस्पतिवार को चंदन की लकड़ी से बनीं भगवान तिरुपति बालाजी की मूर्तियां आकर्षण का केंद्र रहीं। ये न केवल पर्यटकों को लुभा रही हैं, बल्कि अपनी बेशकीमती नक्काशी और दुर्लभता के कारण चर्चा का विषय भी बन रही हैं।
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आंध्र प्रदेश के तिरुपति से आए मूर्तिकार बालकृष्णन ने टाटा मैदान में स्टॉल लगाई है। उनकी कला का जादू यहां लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। सबसे खास बात यह मूर्तियां 50 ग्राम से 400 ग्राम वजन तक में तैयार की गई हैं। जिनकी कीमत 50 हजार से 2 लाख रुपये तक है। इसकी ऊंची कीमत का कारण लाल चंदन की दुर्लभता और उस पर की गई महीनों की मेहनत है। बालकृष्ण ने बताया कि लाल चंदन की लकड़ी बिना किसी पॉलिश के भी सालों-साल चमकती रहती है। इन मूर्तियों से निकलने वाली प्राकृतिक खुशबू पूरे परिसर को भक्तिमय बना रही है। ग्राहकों के बढ़ते क्रेज को देखते हुए इन्हें अब विशेष ऑर्डर पर तैयार किया जा रहा हैं।



 

बोहनी से पहले हुआ 50 लाख का नुकसान, पर जुनून बरकरार
महोत्सव में बृहस्पतिवार को मूर्तियां पहुंचीं, उन्हें पैकिंग खोलकर जब प्रदर्शन के लिए लगाया गया, तो बॉक्स में एक दर्जन से अधिक मूर्तियां टूटी निकली। इनकी कीमत करीब 50 लाख रुपये आंकी गई है। नुकसान झेलने के बावजूद बालकृष्णन का अपनी कला के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ है। परिवहन के दौरान कई महत्वपूर्ण मूर्तियां टूट गईं हैं, जिसे उन्होंने जीवनभर की कमाई का नुकसान बताया। लेकिन अब स्टॉल पर उमड़ रही भीड़ और कला प्रेमियों की सराहना उनके जख्मों पर मरहम का काम कर रही है।

 

काम करना इबादत की तरह
मूर्तिकार बालकृष्णन ने बताया कि लाल चंदन की लकड़ी पर काम करना इबादत की तरह है। एक छोटी सी चूक पूरी मेहनत बर्बाद कर देती है। भले ही मुझे भारी आर्थिक चोट लगी है, लेकिन आगरा के लोगों का प्यार देखकर सुकून मिल रहा है। 

 
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इसलिए है खास
-लाल चंदन दुर्लभ है। मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के जंगलों में पाया जाता है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद कीमती है।
- तिरुपति बालाजी की मूर्तियों के लिए इस लकड़ी को अत्यंत शुभ माना जाता है।
-एक 400 ग्राम की मूर्ति को तराशने में कलाकार को करीब एक महीना लगता है। आंखों और हाथों का सूक्ष्म तालमेल बैठाना पड़ता है।
-ताज महोत्सव में यह स्टॉल दक्षिण भारतीय कला का एक जीवित संग्रहालय बन गई है।

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