नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सिंचाई विभाग को 2010 में आई बाढ़ के आधार पर डूब क्षेत्र का निर्धारण करने का आदेश दिया है। इससे उन बिल्डरों की नींद उड़ गई है जिन्होंने पिछले पांच साल में इस इलाके में भवन खड़े किए हैं। अगर सिंचाई विभाग ने इसी आधार पर बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को चिह्नित किया तो रीयल एस्टेट सेक्टर को तगड़ा झटका लग सकता है।
बता दें, वर्ष 2010 में यमुना का जलस्तर 498 फुट के आसपास पहुंच गया था। तब पोइया, बल्केश्वर और दशहरा घाट ही नहीं, दयालबाग व बल्केश्वर की कई कालोनियों के अलावा कैलाश और यमुना किनारे के तमाम गांवों में पानी भर गया था। घरों में भी पानी घुस गया था। प्रशासन की मदद से बाढ़ में घिरे सैकड़ों लोगों को निकाला जा सका था। कैलाश गांव तो लगभग पूरा ही डूब गया था। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दयालबाग में नाव चलने लगी थीं। यहां अमर विहार के अंदर तक पानी भर गया था। अब इसी क्षेत्र में तमाम नये निर्माण हो गए हैं। कई बिल्डरों ने अपने प्रोजेक्ट शुरू कर दिए हैं। कुछ तो बनकर भी तैयार हैं। ऐसे में यदि तब की बाढ़ के आधार पर यमुना के डूब क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है तो रियल एस्टेट सेक्टर पर तगड़ी चोट पड़ सकती है।
बल्केश्वर में यमुना किनारे से सटी कालोनियों, कृष्णा कालोनी में भी पानी आ गया था। तब राजस्व विभाग की ओर से कुछ लोगों को मुआवजा भी दिया गया था।
इस बार एडीए नहीं बचा पाएगा निर्माणों को ‘डूबने’ से
पिछले दिनों एडीए ने यमुना के डूब क्षेत्र में निर्माणों को चिह्नित करने के नाम पर सिर्फ उन फार्म हाउसों को चिह्नित किया जो नदी किनारे हैं। तमाम ऐसे निर्माण छोड़ दिए थे, जिनसे यमुना और यमुना को इन निर्माणों से खतरा है। तब कार्रवाई करते हुए एडीए ने सिर्फ फार्म हाउसों की बाउंड्री ढहाकर अपनी पीठ थपथपा ली थी। इसके बाद पिछली बार जब ट्रिब्यूनल ने नये सिरे से यमुना के डूब क्षेत्र का निर्धारण करने को कहा तो सिंचाई विभाग ने खानापूर्ति कर दी। 50 और 25 साल के दौरान आई बाढ़ का सर्वे तो कर दिया, लेकिन सर्वे का आधार गोलमोल रहा। इसी आधार पर एडीए ने तमाम बड़ी निर्माणों को डूब क्षेत्र में आने से बचा लिया। हालांकि बाद में इसको लेकर एनजीटी ने सिंचाई को फटकार भी लगाई। मगर, इस बार एडीए चाहते हुए भी डूब क्षेत्र में आने वाले निर्माणों को नहीं बचा पाएगा।
तीन बार से सिंचाई विभाग कर रहा डूब क्षेत्र निर्धारण
तमाम प्रयासों के बाद भी सिंचाई विभाग एनजीटी की आंखों में धूल नहीं झोंक पाया। ट्रिब्यूनल में पिछली तीन सुनवाई के दौरान सिंचाई विभाग को हर बार डूब क्षेत्र के निर्धारण के लिए अलग-अलग निर्देश दिए जा चुके हैं। पहली सुनवाई में सिंचाई विभाग को एडीए के साथ मिलकर डूब क्षेत्र में निर्माणों को चिह्नित करने को कहा गया। अगली सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल इससे संतुष्ट नजर नहीं आया तो विभाग को 50 और 25 साल के दौरान आई बाढ़ के आधार पर डूब क्षेत्र निर्धारण को कहा गया। मगर, सिंचाई विभाग ने इसमें भी खेल कर दिया। विभाग के अधिकारियों की होशियारी देखकर ट्रिब्यूनल ने अब स्पष्ट रूप से उन कालोनियों के नाम से रिपोर्ट तैयार करने को कहा है, जो 2010 में बाढ़ से प्रभावित थीं।
2010 में प्रभावित क्षेत्र
नगला बूढ़ी, त्रिवेणी विहार, अमर विहार, नूरपुर, गिजौली, समोगर, तनौरा, महल बादशाही, मोहम्मदपुर, कैलाश, मनोहरपुर, दयालबाग, प्रेम वाटिका, सिकंदरपुर, विद्यानगर, नगला तल्फी, जोहरा बाग, गढ़ी चांदनी, शंभू नगर, नगला बिहारी, तनौरा, नूरपुर, नगला पैमा, मनोहरपुर, नगला धानी, नगला बूढ़ी, नाहरगंज।