मोदी के वार्षिक रिपोर्ट कार्ड को जनता ने भले ही पास कर दिया हो लेकिन संसद के उनके साथी संतुष्ट नहीं दिखे। जिनके बूते चिलचिलाती धूप में हजारों की भीड़ जनसभा में जुटी, उसी को वह मंच से मोदी के साथ अपना चेहरा नहीं दिखा सके। जिस मोदी की जनसभा में भीड़ जुटाने के लिए इन सांसदों ने दिन-रात एक कर दिए थे, उन्हें ही मंच पर जगह नहीं मिल पाई। ऐसे में मोदी की इस ‘एकला चलो’ स्टाइल से ये सांसद असंतुष्ट भी हुए।
बता दें, दीनदयाल धाम में मोदी की सभा में कई जिलों से लोग आए थे। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और नेताओं के जनसंपर्क-इंतजाम के बूते पहुंचे थे। मगर, पार्टी के जिलों के पदाधिकारी, विधायक तो दूर सांसदों तक को मंच पर जगह नहीं मिली। इनमें केंद्रीय राज्यमंत्री निरंजन ज्योति भी शामिल थीं।
अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम, हाथरस के राजेश दिवाकर, बुलंदशहर के भोला सिंह, फर्रुखाबाद के मुकेश राजपूत, बाराबंकी के जगदम्बिका पाल, एटा के राजवीर सिंह ‘राजू भइया’ ही नहीं सभास्थल से लगे क्षेत्र के सांसद चौधरी बाबूलाल को भी मंच पर जगह नहीं मिली। हालांकि सभा में मथुरा के अलावा आगरा जिले से ही सबसे ज्यादा भीड़ पहुंची थी। मंच पर जगह मथुरा की सांसद हेमामालिनी को ही जगह मिली।
केंद्र सरकार के मंत्री होने के नाते डा. महेश शर्मा और सांसद आगरा डा. रामशंकर कठेरिया भी जगह पा सके। लेकिन मंच पर अपने जनप्रतिनिधि को न देख उनके क्षेत्रों से आए लोगों को निराशा हुई। जनसभा में ज्यादा जोश न आ पाने की एक वजह यह भी आंकी जा रही है। अगर, संबंधित संसदीय क्षेत्र के जनप्रतिनिधि मंच पर होते तो उनके क्षेत्रों के लोगों का उत्साह और ज्यादा नजर आता।
भले बाकी सांसद प्रधानमंत्री के भाषण पर तालियां बजाते रहे लेकिन भीतर कहीं उपेक्षा से उपजी नाखुशी भी थी। ऐसे ही एक सांसद तो यह कहने से भी नहीं चूके कि मंच पर काफी जगह थी। विधायक न सही, कम से कम सांसदों के लिए तो प्रधानमंत्री के पीछे बैठने की व्यवस्था की जा सकती थी। अब इन सांसदों की यह नाखुशी भविष्य में क्या गुल खिलाएगी, अभी कहना जल्दबाजी होगी।