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उम्मीदों के घोंसले: चंबल में चहचहाएगा दुर्लभ परिंदों का कुनबा, इन चिड़ियों ने किया बसेरा

Wed, 06 May 2020 12:14 AM IST
मुकेश कुमार उमेंद्र भदौरिया, अमर उजाला, बाह (आगरा)

सार

  • लुप्तप्राय रिवर टर्न और ब्लैक बेलीड टर्न ने किया बसेरा, अंडे भी दिए
  • ईरान, म्यांमार, थाईलैंड और नेपाल में ही बची हैं ये प्रजातियां
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दुर्लभ प्रजाति के परिंदे - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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करीब 50 घोंसले। हर घोंसले में दो से तीन अंडे...वो भी दुनिया से लुप्त हो रहे रिवर टर्न और ब्लैक बेलीड (दुर्लभ प्रजाति की चिड़ियां) के। लॉकडाउन में प्रकृति और पक्षी प्रेमियों के लिए चंबल की वादियों से यह अच्छी खबर आई है। उम्मीद है कि समय पर इन अंडों से बच्चे निकलेंगे, इन दुर्लभ पक्षियों का कुनबा बढ़ेगा। फिर विभिन्न पक्षियों से गुलजार चंबल में इनकी चहचहाहट भी शामिल हो जाएगी।
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चंबल में इससे पहले लुप्तप्राय इंडियन स्कीमर ने डेरा (नेस्टिंग) डाला था। आगरा जिले के बाह के रेंजर आरके सिंह राठौर ने बताया कि अब रिवर टर्न और ब्लैक बेलीड टर्न चिड़ियों की भी नेस्टिंग हुई है। 

बाह के चीकनीपुरा और नंदगवां में घोंसले बनाकर इन पक्षियों ने अंडे दिए हैं। वनकर्मी उनकी निगरानी कर रहे हैं। यहां इनकी आबादी बढ़ने की संभवना है। राठौर ने बताया कि लुप्तप्राय चिड़ियों की सूची में शामिल ये पक्षी बहुत थोड़ी संख्या में ईरान, म्यांमार, थाईलैंड और नेपाल में ही बचे हैं।

मार्च से मई के बीच होता है प्रजनन काल

दोनों ही प्रजाति की चिड़ियों का प्रजनन काल मार्च से मई के बीच रहता है। नर और मादा एक से दिखते हैं। ये पक्षी नदियों में बने टापुओं पर बालू में घोंसले बनाते हैं। मादा एक बार में दो से तीन अंडे देती है। इनका रंग हरापन लिए सिलेटी या बादामी होता है। 
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छोटी मछलियां या कीड़े-मकोड़े हैं भोजन

रिवर टर्न और ब्लैक बेलीड टर्न का भोजन नदी के कीडे़-मकोडे़, छोटी मछलियां, मेंढक आदि होते हैं। ये मध्यम (38-43 सेमी) आकार के पक्षी हैं। जिनके सिर पर काली टोपी सी होती है। चोंच पीली और पैर लाल होते हैं। दोनों में अंतर शरीर के रंग (ग्रे और काला) का होता है। 

प्रदूषण और मानवीय गतिविधियों से खतरा

इन पक्षियों की घटती संख्या का सबसे बड़ा कारण इनके घोंसलों को नुकसान पहुंचना है। प्रदूषण तो एक बड़ा कारण है ही, नदियों के किनारे और टापू पर बढ़ती मानवीय गतिविधियों से इनके हैबिटेट उजड़ रहे हैं। यही नहीं, बाढ़ से भी इनके घोंसलों को खतरा रहता है। 
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