कासगंज में गंगा वराह भगवान की शोभायात्रा में अबीर गुलाल उड़ाते भक्तजन। (फाइल फोटो)
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तीर्थनगरी में गंगा वराह संग होली खेले जाने की परंपरा लगभग 500 वर्ष पुरानी है। वसंत पंचमी से यह रंगोत्सव शुरू होता है और रंग पंचमी पर संपन्न होता है। इसी के साथ ही रंग पर्व का शुभारंभ होता है। इसके बाद 45 दिन बाद रंगपंचमी पर हुरंगा निकालकर रंगपर्व का समापन होता है। वसंत पंचमी के साथ माघ पूर्णिमा, महाशिवरात्रि, फुुलैरा दूज, रंगभरनी एकादशी पर होली खेलने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। फाल्गुन पूर्णिमा को तीर्थनगरी में 28 स्थानों पर होली जलाने की परंपरा के बाद पड़वा से लेकर पंचमी तक खूब रंग बरसता है। रंग पंचमी पर हर गली से चौपाई गाते हुए हुरंगों की टोलियां निकलती हैं। इन टोलियों में शामिल लोगों को गुझिया, सेव आदि होली पर घर घर बनने वाले पकवान खिलाकर, गुलाल की वर्षा कर स्वागत करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर का जीर्णोद्धार नेपाल के एक नरेश ने लगभग 500 वर्ष पूर्व कराया था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
गंगा वाराह की शोभायात्रा की 2011 से शुरु हुई नवीन परंपरा
तीर्थनगरी की धार्मिक संस्था गंगा भक्त समिति ने 2011 से सभी मोहल्ले की टोलियों का एकीकरण किया। वराह मंदिर से मां गंगा वराह भगवान की शोभायात्रा गाजे बाजे के साथ आओ खेलें गंगा वराह संग होली के रूप में निकालने की परंपरा की शुरुआत की। इस शोभा यात्रा में आकर्षक झांकियां शामिल होती हैं। वहीं अबीर गुलाल उड़ाते हुए हुरंगों की टोलियां शामिल होती हैं।
2 अप्रैल को रंग पंचमी पर निकलेगी भव्य शोभायात्रा
इस बार रंग पंचमी 2 अप्रैल को है। गंगा भक्ति समिति के अध्यक्ष सतीश भारद्वाज ने बताया कि वराह भगवान की भव्य शोभायात्रा धूमधाम से निकाली जाएगी। इसमें एक दर्जन झांकियां शामिल होंगी। उन्होंने कहा कि शोभायात्रा में भक्त अबीर गुलाल उड़ाते हुए शामिल हों।
भगवान वराह मंदिर के प्रांगण होली खेली जाती है। भगवान को नूतन पोशाक पहनाकर भोग लगाया जाता है। इसके बाद ढोलक मजीरों की थाप पर भजन गाते हुए सिंहासन में भगवान को आरूढ़ कराकर नगर भ्रमण कराया जाता है। वहीं नगर में शोभायात्रा निकलती है। - विदेहानंद गिरि, महंत वराह मंदिर
तीर्थनगरी में धार्मिक परंपराओं का लोग निर्वहन करते हैं। शोभयात्रा में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं को भगवान वराह की कृपा सहज ही प्राप्त होती है। मंदिर का जीर्णोद्धार लगभग 500 वर्ष पूर्व नेपाल के एक नरेश ने कराया था। तभी से गंगा वाराह संग होती खेलने की परंपरा है। - पं. राम बल्लभ भट्ट, संस्कृत के विद्वान पूर्व प्रवक्ता।
कासगंज के सोरों में गंगा वराह भगवान की शोभायात्रा में अबीर गुलाल से होली खेलकर चौपाइयों पर झूमते - फोटो : KASGANJ