जन्म: 17 जनवरी, 1923
जन्मस्थान: आगरा
पूरा नाम: तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य
कर्मक्षेत्र: कवि, आलोचक, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार, अनुवादक।
पुरस्कार व उपाधि: हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, डालमिया पुरस्कार उप्र. शासन, राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार
प्रतिनिधि रचनाएं: पतझर, कब तक पुकारूं, सीधा-सादा रास्ता, महायात्रा गाथा...
हिंदी साहित्य का इस दीपक का जीवन मात्र 39 साल का रहा। इतने कम समय में ही उन्होंने 150 पुस्तकों का सृजन कर दिया। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में लिखा। उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, आलोचक, नाटककार, कवि आदि के रूप में पहचान कायम करने वाले रांगेय राघव ताजनगरी के उन चुनिंदा साहित्यकारों में से एक रहे, जिन्होंने विश्वभर में अपनी कलम से धाक जमाई। रांगेय राघव की जयंती पर विशेष...
आगरा के साहित्यकार
- फोटो : अमर उजाला
किसी वाद या विधा में खुद को न बांधने वाले रांगेय राघव हिंदी साहित्य का शेक्सपियर कहे जाते हैं। वह तमिल भाषी थे। लेकिन अपनी अमूल्य रचनाओं से उन्होंने हिंदी साहित्य को परिपूर्ण किया। आगरा के गोकुलपुरा में अक्सर उनकी महफिल जमती थी।
प्रख्यात कवि सोम ठाकुर बताते हैं कि वह इंटर में पढ़ते थे तब रांगेय राघव से उनकी पहली मुलाकात हुई। वह आगरा कॉलेज में आए थे। उनके बोलने के गंभीर लहजे ने काफी प्रभावित किया। सन् 1963 के दौरान आगरा कॉलेज के प्रो. डॉ. घनश्याम अस्थाना के गोकुलपुरा स्थित निवास पर उनका रोज आना-जाना होता था। राघवजी के अलावा डॉ. राम विलास शर्मा, कहानीकार पंडित राजेंद्र यादव आदि जुटा करते थे।
सोम ठाकुर भी उस मंडली में शामिल होते थे। वहां बैठकर नई किताबों पर विचार-विमर्श किया जाता। उन दिनों सेंट जोंस के निकट एक मकान था, वहां भी साहित्यकारों का जमघट लगता था। उन जैसी प्रतिभा हमेशा यादों के रूप में जीवित रहती है।
साहित्यकार
- फोटो : अमर उजाला
लिखने की पद्घति थी विचित्र
रांगेय की लिखने की पद्धति विचित्र थी। वह पहले ही पृष्ठों पर नंबर लिख लिया करते थे और उनकी कहानी या उपन्यास उतने ही पृष्ठों पर समाप्त होता था। अक्सर लिखे हुए को सुनाकर राय पूछा करते। बाग मुजफ्फर खां में पहली बार मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। ग्वालियर से आए कवि शिव नारायण सिंह ने मुझे उनसे मिलवाया था। वह तख्त पर संदूक रखकर लेखन करते थे।
पहली मुलाकात में उन्होंने मुझे उपन्यास ‘कब तक पुकारूं’ कुछ पंक्तियां पढ़कर सुनाईं और मेरी राय पूछी। चंद लाइनों में उन्होंने मार्मिक चित्र खींच दिया। कैफ डी दरोगा नाम की दुकान पर अक्सर सभी कॉफी पिया करते थे। नागरी प्रचारिणी सभा की आयोजित होने वाली गोष्ठी में वह सक्रिय रूप से भाग लेते थे। -राजेंद्र मिलन, साहित्यकार
हमेशा याद रहेंगे
रांगेय राघव मेरे युग से पहले के साहित्यकार हैं, लेकिन वे उन साहित्यकारों में से हैं जिन्हें कालजयी कहा जाता है। ‘कब तक पुकारूं’ को मैंने संभवत: 30 वर्ष पूर्व पढ़ा था, लेकिन उसका एक-एक दृश्य अभी तक स्मृति पटल पर अंकित है। बाद में इस पर निर्मित धारावाहिक भी बेहद लोकप्रिय हुआ। जनजातियों और अभिजात्य वर्ग के विडंबना पूर्ण संबंधों का ऐसा चित्रण किसी ने नहीं किया। ‘मुर्दों का टीला’ भी अद्भुत उपन्यास है। मोहन जोदड़ो की सभ्यता और संस्कृति के जीवंत चित्रण के लिए वह हमेशा याद किए जाएंगे। -सुशील सरित, साहित्यकार
14 वर्ष की उम्र में शुरू किया लेखन
रांगेय राघव ने सन् 1937 से 14 वर्ष की उम्र में लेखन कार्य शुरू कर दिया था। जब वह आगरा में 11वीं कक्षा में अध्ययन कर रहे थे, तब उनका पहला उपन्यास ‘घरौंदा’ आया। वह जीवन के अंतिम समय तक लिखते रहे। वह घर और दोस्तों में पप्पू नाम से लोकप्रिय थे। उनके घर में या तो तमिल बोली जाती थी या शुद्ध ब्रजभाषा।
डिग्री लेने नहीं गए थे
उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए और ‘गुरु गोरखनाथ और उनका युग’ विषय पर पीएचडी की। दिनरात एक करके शोध पूरा किया। लेकिन उपाधि मिलने का समय आने पर दीक्षांत समारोह से एक दिन पूर्व गांव चले गए। अन्य लोगों के घर बैठकर ही थीसिस लिखकर डिग्री हासिल करने से वह व्यथित थे। लिहाजा अपनी पीएचडी डिग्री लेने नहीं गए।
बहुमुख प्रतिभा के धनी
रांगेय राघव अच्छे चित्रकार थी थे। उनका कालिदास के मेघदूत का पद अनुवाद अब तक के सभी अनुवादों में श्रेष्ठ माना जाता है। समाजशास्त्र पर भी उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं।