मुकद्दस रमजान में पहली बार रोजा रखने वाले बच्चों में खासा उत्साह है तो वहीं बरसों से रोजे रखने वाले बुजुर्ग भी इबादत करने को तैयार हैं। हालांकि लॉकडाउन की दिक्कतों के कारण इस दफा अभिभावकों ने अभी अपने बच्चों से कहा है कि सब्र करें। इबादत के लिए पूरा महीना है। वैसे भी पहली दफा रोजा अमूमन 10वें रोजे के बाद ही रखा जाता है।
लॉकडाउन के कारण पहली बार रोजा रखने वाले बच्चों के अभिभावक अभी तैयार नहीं हैं, क्योंकि लोगों को इस माहौल में आसानी से खानपान की चीजें नहीं मिल पा रही हैं। रोजेदारों के लिए सबसे अहम खजूर तक बाजार में नहीं आ सकी है। ऐसे में अभिभावक सोच रहे हैं कि बच्चों को पहला रोजा कैसे रखवाया जाए।
10 रमजान तक बड़े रखते हैं रोजा
ढोलीखार के अदनान ने बताया कि उनका छोटा भाई पहली दफा रोजा रखेगा, लेकिन अभी काफी दिन बकाया हैं। पहले 10 रमजान तक तो बड़े लोग ही रोजे रखते हैं। मंटोला के 104 साल के इमामुद्दीन हर बार रोजा रखते हैं। इस बार भी वह रोजा रखने को पूरी तैयार हैं।
उनके पौत्र आमिर ने बताया कि बाबा हर बार रोजा रखते हैं और पांच वक्त की नमाज पढ़ने के लिए मस्जिद में जाते हैं, लेकिन इस बार वह घर में रहकर ही इबादत करेंगे और रोजा रखेंगे।
हॉस्पिटल रोड के सैयद इरफान सलीम ने बताया कि इस दफा बच्चों ने पहली दफा रोजा रखने की बात कही मगर अभी इस पर एकराय नहीं बनी है। माहौल में बदलाव आ जाए। लॉकडाउन खुल जाए तो बच्चे भी पहला रोजा रख सकते हैं, उन्हें आसानी रहेगी।
'पहली बार रखूंगा रोजा'
ढोलीखार के अली अहमद ने बताया कि पहली बार रोजा रखने की तैयारी कर रहा हूं। अभी वालिद से इस बारे में बात नहीं हुई है, लेकिन परिवार के अन्य सदस्य राजी है। परिवार के सभी सदस्य रोजा रखते हैं, ऐसे में मैं भी रोजा रखना चाहता हूं।
मंटोला के इमामुद्दीन ने बताया कि रमजान के मुकद्दस महीने में रोजा रखने के लिए बीमारी को भी भूल जाता हूं। इस पाक महीने में रोजा रखने पर ताकत अल्लाह-तआला दे ही देता है। कब से रोजा रखना शुरू किया, इतना अब याद नहीं है।
नहीं हो सकेगी रोजा कुशाई
नई बस्ती के मोहम्मद जमील ने बताया कि पहला रोजा रखने वाले बच्चों के लिए रमजान में दावत दी जाती है। बाकायदा रोजा कुशाई की रस्म होती है, लेकिन ऐसे में जब सोशल डिस्टेंसिंग चल रही है।
लोग एक दूसरे के घरों में जाने से कतरा रहे हैं तो दावत कैसे दी जा सकेगी। रोजा कुशाई के लिए धूमधाम से दावत होती है। इस बार तो ऐसा माहौल ही नहीं है। लोग केवल इबादत करने पर जोर दे रहे हैं।