आरबीएस कॉलेज कृषि संकाय बिचपुरी के शस्य विज्ञान विभाग के अनुसंधान प्रक्षेत्र पर प्रोफेसर राजवीर सिंह के निर्देशन में पिछले चार साल से चल रहे जौ की फसल में हाइड्रोजैल के प्रयोग पर अनुसंधान कार्य संपन्न हुआ है। यह अनुसंधान भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान करनाल, हरियाणा एवं कृषि रसायन संभाग, आईएआरआई, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में हुआ है। आगरा मंडल के लिए जौ की प्रजाति बीएच 946 अच्छी है।
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शस्य विज्ञान विभाग के प्रो. राजवीर सिंह ने बताया है कि भारतीय कृषि का 60% क्षेत्रफल वर्षाधीन है, जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। प्रो. सिंह ने कहा कि पूसा हाइड्रोजैल एक स्वदेशी उत्पाद है, जिसे भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, पूसा नई दिल्ली द्वारा शुष्क क्षेत्रों में खासकर जहां सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध नहीं है, उन क्षेत्रों में फसलों की पैदावार बढ़ाने हेतु विकसित किया गया है। हाइड्रोजैल एक अघुलनशील तथा प्रकृति में हाइड्रोफिलिक है तथा यह अपने वजन से 400 से 800 गुना मिट्टी में पानी अवशोषित करके फसलों की जड़ों को फसल की वृद्धि एवं विकास अवस्थाओं पर लंबे समय तक पानी उपलब्ध कराता रहता है।
पूसा हाइड्रोजैल महीन दानेदार पाउडर के रूप में जिसका रंग भूरा होता है, जौ की फसल में बुवाई के समय कूंड (गढ्ढे) में 2.5 कि.ग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाकर देने की संस्तुति की जाती है। जौ की फसल में हाइड्रोजैल के प्रयोग पर है कॉलेज के प्राचार्य प्रो. विजय श्रीवास्तव एवं शस्य विज्ञान विभाग के प्रभारी प्रो. संत बहादुर ने हर्ष व्यक्त किया है। उन्होंने बताया कि आगे भी कृषि में नवाचार करना बेहद ज़रूरी है।
तीन सिंचाई के बराबर मिली पैदावार
प्रो. राजवीर सिंह ने बताया कि जौ की फसल में पूसा हाइड्रोजैल एवं न्यू हाइड्रोजैल का प्रयोग से तीन सिंचाइयों के बराबर पैदावार मिली। जौ की फसल में केवल एक सिंचाई लगाकर लगभग 15-20% अधिक पैदावार प्राप्त हुई तथा दो सिंचाइयों की बचत हुई। इसके साथ ही मिट्टी के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में भी सुधार देखा गया।
दुनिया भर में होती है जौ की खेती, 7% हिस्सेदारी
दुनिया के सभी देशों में की जाने वाली जाै की खेती गेहूं, चावल एवं मक्का के बाद महत्वपूर्ण अनाजों में क्षेत्रफल एवं उत्पादन के मामले में चौथे स्थान पर है। जौ की वैश्विक अनाज उत्पादन में लगभग 7% हिस्सेदारी है। जौ का प्रयोग औद्योगिक रूप में बीयर, शराब, व्हिस्की, अल्कोहल, सिरका आदि के रूप में करने के साथ-साथ गेहूं, चना एवं जौ (मल्टीग्रेन आटा) तथा सत्तू के रूप में भी प्राचीन काल से किया जा रहा है। यह दुनिया की सबसे प्राचीनतम फसल है। खासकर शुष्क क्षेत्रों हेतु जौ की फसल किसानों के लिए काफी लाभप्रद है।