एक तरफ अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति जगह-जगह भाजपा का विरोध कर रही थी तो दूसरी ओर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का एक ऑडियो मोबाइल-मोबाइल घूम रहा था। संघर्ष समिति भाजपा को जाटों के खिलाफ बता रही थी। ऑडियो भाजपा को उनका हिमायती बता रहा था। मुकाबला जबरदस्त था। भाजपाई तक टेंशन में थे कि कहीं जाट वोटर भाजपा से नाराज होकर रालोद के रंग में न रंग जाएं। नतीजों के बाद माना जा रहा है कि जाट वोटरों ने अमित शाह पर ज्यादा भरोसा किया। इसका सुबूत है भाजपा के टिकट पर 14 जाट उम्मीदवारों को विजय मिल जाना।
यह भी साफ लग रहा है कि भाजपा को रालोद के मुकाबले जाट वोट ज्यादा मिले हैं। रालोद सिर्फ बागपत की छपरौली सीट पर सिमटकर रह गया है। ब्रज में तो खाता तक नहीं खुला है।
जिस मथुरा से 2009 में जयंत चौधरी लोकसभा चुनाव और 2012 में विधान सभा चुनाव जीते, वहां इस बार रालोद के उम्मीदवार धूल चाट गए।
आगरा की जिस फतेहपुर सीकरी को कभी रालोद नेता दूसरी छपरौली कहते थे, वहां रालोद उम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहे जबकि यहां चौधरियों की शान कही जाने वाली चाहरवाटी भी है।
अब सवाल उठ रहा है कि क्या जाट आरक्षण का मुद्दा बेअसर रहा। बता दें, चुनाव के दौरान संघर्ष समिति ने ब्रज की भी सभी जाट बहुल सीटों पर जाकर भाजपा के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इन सीटों पर रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह और महासचिव जयंत चौधरी रैली करने भी आए थे। इन सभी पर रालोद को हार का मुंह देखना पड़ा है। चुनाव के दौरान ही अमित शाह का एक ऑडियो वायरल हुआ था। इसमें वह कह रहे थे कि जाटों के पास भाजपा से बेहतर विकल्प नहीं है। जाटों के हित में भाजपा ने सबसे ज्यादा काम किए हैं।
पहली बार जीते 16 जाट उम्मीदवार
आगरा। अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक का कहना है कि उनके आंदोलन ने असर दिखाया है। इसी के चलते भाजपा ने इस बार 16 टिकट जाटों को दिए। इनमें से 14 जीत गए हैं। छपरौली में रालोद से जाट विधायक बना है। कुल मिलाकर 16 जाट विधायक बने हैं। ऐसा पहली बार हुआ है। 2012 में पांच जाट विधायक थे।
खत्म नहीं हुआ मुजफ्फरनगर दंगे का असर
आगरा। जाट बेल्ट में कमल खिलने के सवाल पर मलिक का कहना था कि जाट आरणक्षण के विरोध पर जाटों की भाजपा से नाराजगी जरूर है लेकिन मुजफ्फरनगर दंगे का असर अभी तक खत्म नहीं हुआ है। सवाल जब दो दलों के बीच एक के चयन का आता है, तो उनकी पसंद भाजपा ही होती है।
बिगड़ गया है रालोद का समीकरण
आगरा। राजनीति के जानकारों का मानना है कि रालोद का समीकरण बिगड़ गया है। चुनाव के शुरू में जाट साथ आ जाते हैं, रैलियों में भीड़ जुटती है लेकिन दूसरा कोई खास तौर से मुस्लिम साथ नहीं आते। इसके चलते वोटिंग से ऐन पहले रालोद को जीतता न देख जाट भी भाजपा के साथ हो जाते हैं।