मैनपुरी। पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का मैनपुरी से पुराना नाता रहा है। चुनावों के दौरान उनकी भाषाशैली और व्यवहार के भाजपा नेता और कार्यकर्ता आज भी कायल हैं।
लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान पार्टी नेताओं की मांग पर भाजपा के हाईकमान ने चुनाव-प्रचार के लिए कई बार सुषमा स्वराज को मैनपुरी भेजा। लोकसभा सीट तो भाजपा कभी नहीं जीत सकी, लेकिन हर बार पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का दिल जीतने में कामयाब रहीं।
कार्यकर्ता आज भी उनको दीदी के नाम से ही याद करते हैं। चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं को निर्देश नहीं परिवार की तरह दी गई नसीहत आज भी याद है। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष शिवओंकार नाथ पचौरी बताते हैं कि वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी अशोक यादव के समर्थन में सभा करने आईं सुषमा स्वराज ने कहा था परिवार की तरह मिलकर काम करोगे तो सामने वाला हमेशा डरेगा। घर के झगड़े घर में ही मिल बैठकर तय किए जाते हैं।
लोकसभा क्षेत्र संयोजक प्रभात चतुर्वेदी बताते हैं कि दीदी का सरल स्वभाव कभी नहीं भूल सकते। सभाओं के दौरान माल्यार्पण कराने से उनको परहेज था। वह कहती थीं घर के सदस्य को माला नहीं पहनाते उसकी अच्छी बातों का अनुसरण करते हैं।
भाषण शैली से ही जीतती थीं दिल : पूर्व विधायक
पूर्व विधायक अशोक चौहान ने वर्ष 2002 में मैनपुरी विधानसभा से चुनाव लड़ा। सुषमा स्वराज उनके समर्थन में छोटे क्रिश्चियन मैदान में सभा करने आईं। पूर्व विधायक बताते हैं उन्होंने ओजस्वी और संयमित भाषण से कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया। सात दिन के अंदर ही चुनावी माहौल बदला और वह विधायक बन गए।
‘माला नहीं जीत का भरोसा दो’
वर्ष 2002 में अरविंद तोमर भाजपा के जिलाध्यक्ष थे। वह बताते हैं चुनावी सभा के दौरान जब उनको माला दी तो वह बोलीं भइया माला नहीं जीत का भरोसा दो। उन्होंने मंच पर मौजूद नेताओं से माला की जगह जीत का भरोसा ही लिया। उनकी भाषाशैली का ही नतीजा था कि कार्यकर्ता दीदी-दीदी के नारे लगाने लगे। उन्होंने भी कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया।