डीआईजी के अल्टीमेटम की लाज नहीं रख पाए थानेदार। शहर से देहात तक दहशत फैला देने वाली 10 संगीन वारदात का सात दिन में खुलासा करना तो दूर , एक में भी जरा सा सुराग तक हासिल नहीं कर पाए। उलझी गुत्थियां सुलझाने में इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के मास्टर भी फेल हुए और फोरेंसिक साइंस के एक्सपर्ट भी। बदमाशों तक पहुंचने के लिए पुलिस ने स्केच का सहारा भी लिया, लेकिन यह ‘कलाकारी’ भी दिल बहलाने के सिवाय कुछ काम न आई। हैरानी की बात यह है कि तमाम नाकामियों से पुलिस कोई सबक नहीं ले रही। फिर बेकाबू होते अपराध पर काबू हो जाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। पेश है चंद्रमोहन शर्मा की रिपोर्ट...
1. कैमरे लगवा दिए, मॉनीटर कोई देखता नहीं
क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम ( सीसीटीएनएस) के तहत जगह जगह सीसीटीवी कैमरे तो लगवा दिए गए, लेकिन थानों में लगे इनके मॉनीटर को देखने वाला कोई नहीं है। हरीपर्वत थाना के सामने लगे चार कैमरों में से दो खराब हैं। शेष दो काम कर रहे हैं लेकिन अगर कोई बदमाश इनके सामने से गुजरे, तो पुलिस को पता नहीं चलेगा, क्योंकि थाने की मरम्मत के चलते मॉनीटर और डीवीआर महीने भर से डिब्बे में बंद हैं। सराफ धन कुमार जैन पर हमला करने के बाद बदमाश थाना एमएम गेट पर लगे कैमरों के सामने से भागे, लेकिन मॉनीटर पर कोई देखने वाला ही नहीं था। दरअसल, सभी थानों पर मॉनीटर थाना प्रभारियों के दफ्तर में लगे हैं। वे थोड़ी देर बैठते हैं। इसके बाद मॉनीटर देखने वाला कोई होता ही नहीं है। एसएसपी दफ्तर में भी जब ‘साहब’ नहीं होते हैं, तो कोई मॉनीटर देखने की जरूरत नहीं समझता।
2. स्केच को मजाक बना दिया
खंदौली में बैंक डकैती के 16 दिन बाद पुलिस को स्केच बनवाने की याद आई। भला इतने दिन किसी को वो चेहरे कहां याद रहते हैं, जो सिर्फ पांच मिनट ही देखे गए हों। वो भी डरते-डरते। इसी तरह पशु व्यापारियों से हुई एक करोड़ कैश की लूट और लॉयर्स कॉलोनी की डकैती में भी वारदात के 24 घंटे बाद स्केच बनवाए गए। फिर नतीजा कैसे निकलता? कोई स्केच काम नहीं आया। वैसे भी पुलिस के स्केच कभी सटीक नहीं बन पाते। सराफ रिंकू बंसल से लूट करने वाले बदमाश जब पकडे़ गए तो उनके चेहरे स्केच से जरा भी मेल नहीं खा रहे थे। दरअसल, हो यह रहा है कि जब किसी वारदात का खुलासा नहीं हो पाता, तो पीड़ितों को तसल्ली देने के लिए बदमाशों के स्केच बनवा दिए जाते हैं। खुद पुलिस भी इन्हें गंभीरता से नहीं लेती। एक स्केच बनवाने में एक से पांच हजार तक खर्च आता है। वारदात हाईप्रोफाइल हो तो दिल्ली से स्केच एक्सपर्ट बुलाए जाते हैं, वरना लोकल आर्टिस्ट से ही काम चला लिया जाता है।
3. फोरेंसिक जांच कराई, पर रिपोर्ट नहीं आई
खंदारी के ग्रोवर दंपति हत्याकांड में भी फोरेंसिक इंवेस्टिगेशन कराई गई लेकिन पुलिस को इसकी रिपोर्ट आज तक नहीं मिली। इससे पहले एमटेक छात्रा तोशी सेठ की रहस्यमय मौत की गुत्थी सुलझाने के लिए बुलाई गई फोरेंसिक लैब की टीम ने कोई रिपोर्ट नहीं दी। ऐसा शायद इसलिए हो रहा है क्योंकि फोरेंसिक टीम किसी नतीजे पर पहुंच ही नहीं पा रही है। वैसे इस नाकामी की वजह भी पुलिस की लापरवाही है। फोरेंसिक साइंस लैब के वैज्ञानिकों का कहना है कि क्राइम सीन को येलो टेप से घेरा बनाकर सुरक्षित करके सबसे पहले फोरेंसिक एक्सपर्ट बुलाए जाने चाहिए। लेकिन यहां तो पहले खुद पुलिस ही पूरा क्राइम सीन बिगाड़ देती है। पुलिसवाले दस्ताने पहने बगैर आला कत्ल तक हाथ में उठा लेते हैं। फिर पब्लिक भी अपनी दिमाग लगा लेती है। जब पूरा सीन खत्म हो चुका होता है, फिंगर प्रिंट तक नहीं बचते, तब फोरेंसिक टीम बुलाई जाती है। खंदारी केस में सात दिन बाद फोरेंसिक एक्सपर्ट की मदद ली गई? मौके पर कुछ बचा ही नहीं था, तो रिपोर्ट में क्या लिखकर देते ?
4. खोजी कुत्ते भी नहीं खोज पाए अपराधी
जो परेशानी फोरेंसिक एक्सपर्ट के सामने है, वही डॉग स्कवैड की दिक्कत है। यही वजह है कि क्राइम सीन पर बुलाए जाने वाले खोजी कुत्ते अपराधियों का कोई सुराग नहीं दे पा रहे। स्कवैड के अधिकारी कहते हैं कि अगर क्राइम सीन पर 50-100 लोगों के पहुंचने के बाद खोजी कुत्ता बुलाया गया है, तो वह अपराधी की गंध को कैसे पहचान सकता है? स्निफर डॉग की मदद से कई बार विस्फोटक सामग्री पकड़ी गई। जब क्राइम सीन पर ट्रैकर डॉग जल्दी बुलाए गए, तब उन्होंने अपराधियों का सुराग दिया। लेकिन देरी से बुलाने पर कुछ नहीं कर पाते। वैसे भी आर्मी की तरह जिला पुलिस अपने खोजी कुत्तों को नई नई ट्रेनिंग नहीं कराती। सीबीसीआईडी ने एक बार ट्रेनिंग कराकर जो डॉग दे दिए, उनकी मृत्यु होने तक उनसे ही काम चलाना पड़ता है। आगरा पुलिस के पास पांच खोजी कुत्ते हैं। पांचों मादा हैं। इनमें से तीन स्निफर डॉग विस्फोटक सामग्री सूंघने के एक्सपर्ट हैं। इनमें से पांच पांच साल की दो लैबरा डॉर एक्सली और एक्सी हैं, तीसरी है सात साल की डोबरमैन डॉली। दो आठ साल की ट्रैकर हैं जिन्हें चोरी, डकैती, हत्या जैसी वारदात पर बुलाया जाता है। ये हैं जर्मन शेफर्ड नीलिमा और लैबरा डॉर सोनी। प्रत्येक के खाने पर रोजाना 218 रुपये खर्च होते हैं।
आज से समीक्षा करेंगी डीआईजी
डीआईजी लक्ष्मी सिंह बुधवार से तमाम वारदात की जांच की प्रगति की समीक्षा करेंगी। उन्होंने अल्टीमेटम दिया था कि सात दिन में केस न खोल पाने वाले थानेदारों पर कार्रवाई की जाएगी। यह अवधि मंगलवार शाम समाप्त हो गई। एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह ने ऐसे सभी थानेदारों के खिलाफ पहले ही प्रारंभिक जांच के आदेश दे दिए हैं।