खुले आसमान के नीचे रात बिताने वाले सर्दी में भी नहीं जाते शेल्टर होम
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खुले आसमान के नीचे रात बिताने वालों को राहत देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नगर निगम ने शहर में रैन बसेरे (शेल्टर होम) की व्यवस्था की है लेकिन सभी सुविधाओं से युक्त इन शेल्टर होम में भी लोग जाने को तैयार नहीं है। अमर उजाला की टीम ने सोमवार रात को शहर की सड़कों पर सोने वालों और शेस्टल होम का जायजा लिया तो कुछ ऐसी ही तस्वीर सामने आए। शेल्टर होम में न जाने वालों के कुछ अपने ही तर्क थे।
एमजी रोड पर हरीपर्वत थाने के पास अपनी पांच वर्ष की नातिन के साथ फुटपाथ पर सो रही करीब 60 वर्षीय बेबी के पुत्र और पुत्र वधू की मौत हो चुकी है। जब उससे पूछा गया कि इस कड़ाके की ठंड में सड़क पर क्यों सो रही हो, नगर निगम के रैन बसेरे में क्यों जाती। इस पर बेबी ने कहा कि वहां हर तरह आदमी आता है। शराबी, कबाबी आते हैं, इसलिए यहां सड़क किनारे ही वह सुरक्षित है। सेंट जोंस पर अपने परिवार के साथ रहे राम आसरे ने कहा कि जो अस्थायी रैन बसेरे सड़क किनारे लगते हैं। वहां अपने परिवार के साथ रहना मुश्किल है। यहां तिरपाल डाल ली है, इसी के नीचे परिवार के सभी सदस्य रहते हैं।
नगर निगम ने शेल्टर होम में सभी व्यवस्था की हैं लेकिन लोगों को समझाने के बाद भी उन्हें सड़क पर ठंड में परेशान होना मंजूर है। लोहामंडी में 75 बेड का शेल्टर होम निर्माणधीन है और 15 बेड का शेल्टर होम चालू है। यहां तख्त बिछे हैं। रजाई, गद्दों की व्यवस्था है। किचन, टायलेट, अलाव की व्यवस्था है लेकिन कोई रहने नहीं आता है। चौकीदार ने बताया कि वह लोगों को बुलाने भी जाता है। खंदारी का तीन मंजिला शेल्टर होम भी खाली पड़ा है। केवल दो कमरों में बिलासपुर के मजदूर रहे रहे हैं। राजा मंडी रेलवे स्टेशन के पास शेल्टर होम में सभी व्यवस्था हैं लेकिन वहां प्रतिदिन एक या दो ही लोग पहुंचते हैं।