दिवंगत तृप्त होकर देते हैं आशीष
सूकरक्षेत्र में हरिपदी किनारे जो श्रद्धालु सत्य व श्रद्धा से श्राद्ध और तर्पण कर्म करते हैं उससे माता पिता, आचार्य व अन्य सभी दिवंगत सगे संबंधी तृप्त हो अपनी संतानों को खुशहाली का आशीष देते हैं। वेद पुराणानुसार यह श्राद्ध तर्पण हमारे पूर्वज, माता पिता, और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। पितरों के कल्याणार्थ इन श्राद्ध के दिनों में श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करके तिल जौ चावल मिश्रित जल से तर्पण करने से वे तृप्त होते हैं। श्राद्ध का समय दोपहर 12 से एक बजे तक है। पौराणिक उल्लेखों के अनुसार भगवान वराह की अवतरणस्थली सूकरक्षेत्र में श्राद्ध कर्म सर्वोपयुक्त माना गया है।
- पंडित भारत किशारे दुबे, तीर्थ पुरोहित।
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