जयपुर राजघराने की 100 बीघा में फैली संपत्ति जयपुर राज हाउस की दो कोठियों की अहमियत इतनी थी कि आजादी के तुरंत बाद हुए दंगों में इसकी सुरक्षा के लिए पीएसी के जवान तैनात किए गए। एक अप्रैल 1948 से 28 फरवरी 1949 तक जयपुर राज हाउस में मौजूद स्टेट जीएसटी के वर्तमान कार्यालय को जवानों के लिए बैरक का रूप दिया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग ने इसके लिए 3300 रुपये का किराया उस समय दिया था।
11 नवंबर 1954 को गृह विभाग के सहायक सचिव जीसी पांडे ने तत्कालीन इंस्पेक्टर जनरल को पत्र लिखकर बताया कि आगरा में जयपुर राज हाउस में 10वीं वाहिनी पीएसी की बटालियन रही है। तत्कालीन राज्यपाल की स्वीकृति से पीएसी के रहने के दौरान एक अप्रैल 1948 से 28 फरवरी 1949 तक की अवधि के लिए 3300 रुपये किराया तय किया गया। हर माह 300 रुपये का किराया इन बैरकों के लिए दिया गया था। उस दौरान यह किराया डीएम को आकस्मिक शुल्क के रूप में जमा कराया गया।
जयपुर हाउस में ही बना सचिवालय भवन
वर्ष 1836 में ब्रिटिश सरकार ने आगरा प्रेसिडेंसी की जगह नॉर्थ वेस्ट प्रॉविंस का गठन किया। तत्कालीन लेफ्टिनेंट जनरल के लिए कोठी मीना बाजार में बनी फिदाई हुसैन की हवेली को तोड़कर निवास बनाया गया। इसी के नजदीक बने जयपुर हाउस में मौजूदा एडीए कार्यालय और स्टेट जीएसटी कार्यालय की कोठियों को ब्रिटिश सरकार का सचिवालय भवन बनाया गया था।
18 जनवरी 1954 को प्रदेश सरकार के सचिव केएन सिंह को आगरा इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के प्रशासक ने अपने पत्र में इसका ब्योरा दिया है। उन्होंने लिखा कि जयपुर हाउस ब्रिटिश शासन की प्रांतीय सरकार का सचिवालय भवन रहा है। यहां नगर पालिका और आगरा इंप्रूवमेंट ट्रस्ट का कार्यालय एक साथ होना चाहिए। इन दोनों का प्रशासक एक ही अधिकारी है, ऐसे में दोनों कार्यालय जयपुर हाउस में स्थानांतरित कर दिए जाएं।
1954 में गोदाम के रूप में किया इस्तेमाल
1954 से 1955 के बीच उत्तर प्रदेश सरकार को भेजे गए पत्रों में जयपुर हाउस के बारे में लिखा गया है कि यहां मुख्य भवन का उपयोग गोदाम के रूप में किया जा रहा है। यह दयनीय हालत में है। 20 साल से इसकी मरम्मत नहीं हुई। पीएसी के हटने के पांच साल के अंदर ही यहां दरवाजे और खिड़कियां गायब हो गए। जो थे, वह जर्जर हो चुके। फर्श गायब हो चुका है। जगह-जगह गड्ढे हैं, छतें टपक रही हैं और उन्हें तत्काल मरम्मत की आवश्यकता है। ऐसा न होने पर भवन के गिरने की आशंका जताई गई। यहां अस्तबल की ओर दो भवन और नौकरों के लिए क्वार्टर थे, जिनकी मरम्मत नहीं की गई। इंजीनियरों से सर्वे कराया गया, जिसमें अकेले मुख्य भवन की उचित मरम्मत और उसे रहने योग्य बनाने के लिए लाखों रुपये का खर्च बताया गया है।
आरएसएस के सर सहकार्यवाह ने देखा था शिलापट
जयपुर हाउस निवासी और आरएसएस से जुड़े विजय गोयल ने बताया कि सात साल पहले सर सहकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जयपुर राजघराने के शिलापट को देखने आए थे जो लोहामंडी थाने के सामने खतैना रोड के मोड़ पर लगा हुआ है। आंबेडकर विश्वविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष रहे डॉ. सुगम आनंद के शोध में छत्रपति शिवाजी महाराज से जयपुर हाउस का जुड़ाव बताया गया था।
नगर आयुक्त संतोष कुमार वैश्य ने बताया कि नगर महापालिका के पास जयपुर हाउस की जमीन कब आई, इसका ब्योरा मांगा गया है। इससे जुड़े सभी दस्तावेज की जांच की जा रही है। राजस्व अभिलेखों के साथ पूरा रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है।
एडीएम प्रशासन आजाद भगत सिंह का कहना है कि हम इस मामले में सभी स्रोतों से जानकारी जुटा रहे हैं। कई अभिलेख मांगे गए हैं। सभी तथ्य जुटाकर शासन को पूरा ब्योरा भेजा जाएगा।