आगरा। सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा से जुड़े मामले में ओवरलोड वाहनों के खिलाफ प्रवर्तन व्यवस्था को प्रभावी बनाने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने भार मापन व्यवस्था मजबूत करने, इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन को प्रभावी बनाने और ओवरलोड वाहनों की पहचान, दंड और अतिरिक्त भार वास्तव में उतरवाए जाने का रिकॉर्ड रखने पर भी जोर दिया है।
अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन ने वाद दायर कर ओवरलोडिंग के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की मांग रखी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित होकर तर्क दिया कि केवल जुर्माना या अतिरिक्त शुल्क वसूलकर ओवरलोड वाहन को उसी अतिरिक्त भार के साथ आगे जाने देना सड़क सुरक्षा के उद्देश्य को पूरा नहीं करता। उन्होंने सुझाव दिया कि ओवरलोड वाहन को रोककर पहले अतिरिक्त भार उतरवाया जाए, फिर उसका दोबारा वजन किया जाए और निर्धारित सीमा के भीतर आने के बाद ही उसे आगे जाने दिया जाए।
उन्होंने एनएचएआई की ओवरलोडिंग संबंधी मानक कार्यप्रणाली लागू करने, वजन मापन, इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन और अतिरिक्त भार उतारने की पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड रखने की भी मांग की। वर्ष 2005 के परमजीत भसीन बनाम भारत संघ फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जुर्माना भरने से अतिरिक्त भार ढोने का अधिकार नहीं मिलता। उनके अनुसार मोटर वाहन अधिनियम की धारा 113, 114 और 194 के प्रावधानों का उद्देश्य केवल आर्थिक दंड नहीं बल्कि अतिरिक्त भार हटाकर वाहन को सुरक्षित स्थिति में लाना है।
पांच साल में 60,082 मौतें
आवेदन में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की रिपोर्टों के आधार पर बताया गया है कि 2019 से 2023 के बीच ओवरलोड वाहनों से 1,40,945 दुर्घटनाएं हुईं और इनमें 60,082 लोगों की मौत हो हुई। केसी जैन ने कहा कि आरटीआई से मिली जानकारी में 27 टोल प्लाजा पर तीन साल में 28,80,115 ओवरलोड वाहन पकड़े गए लेकिन अतिरिक्त भार उतरवाए जाने का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।