आगरा। सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वाले मृतक के परिवार के लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) से मिलने वाला मुआवजा एकमात्र सहारा होता है मगर मुआवजा पाने के लिए लंबी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन ने इस समस्या के संबंध में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट सड़क सुरक्षा समिति को एक प्रतिवेदन भेजा है, जिसमें देशभर में मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों की वास्तविक स्थिति, लंबित मामले, वसूली की समस्याएं और व्यावहारिक समाधान रखे गए हैं। इसकी प्रति सचिव, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को भी भेजी है।
अधिवक्ता केसी जैन ने बताया कि वित्तीय सेवा विभाग की ओर से प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर 2025 तक देश में 1034712 मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले लंबित हैं। लगभग 46.5 प्रतिशत मामले दो वर्ष से अधिक समय और 21 प्रतिशत से अधिक मामले पांच वर्ष से भी अधिक समय से लंबित हैं। जिस मुआवजे का उद्देश्य तुरंत राहत देना था, वह आज सालों के इंतजार में बदल चुका है। कई मामलों में न्यायाधिकरण मुआवजा तय कर देता है, लेकिन वाहन बीमित नहीं होता या तकनीकी कारणों से बीमा कंपनी को जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाता है तो मुआवजा निजी वाहन मालिक से वसूलना पड़ता है।
यहीं से पीड़ित परिवार की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है। वाहन मालिक के पास कोई दर्ज संपत्ति नहीं होती। सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख बीमा कंपनियां जैसे न्यू इंडिया इंश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, ओरिएंटल इंश्योरेंस और नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के साथ कई निजी बीमा कंपनियों के विरुद्ध भी हजारों मोटर दुर्घटना मुआवजे दावे लंबित हैं।
लंबित मामले की अवधि मामलों की संख्या कुल मामलों का प्रतिशत
लंबित मामले की अवधि
मामलों की संख्या
कुल मामलों का प्रतिशत
1 वर्ष से कम
3,42,812 33.13%
1 से 2 वर्ष
2,10,771 20.36%
2 से 3 वर्ष
1,34,886 13.03%
3 से 5 वर्ष
1,28,855 12.45%
5 वर्ष से अधिक
2,17,388 21.03%
कुल
10,34,712 100%
ये हैं कमियां
- देश-भर के एमएसीटी मामलों का कोई एकीकृत राष्ट्रीय डिजिटल डाटा नहीं
- अपील और वसूली (एक्जीक्यूशन) की स्थिति पारदर्शी नहीं
- अलग-अलग अदालतों में मुआवजे की गणना अलग-अलग
- तकनीक और डिजिटल साधनों का अत्यंत सीमित उपयोग
- यह स्थिति न्याय, समानता और मानवीय गरिमा-तीनों के विरुद्ध है।